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कारगिल युद्ध के हीरो के मुस्लिम परिवार पर ‘बांग्लादेशी’ होने का आरोप! पुणे में हिंदू भीड़ ने आधी रात को बोला हमला, दस्तावेज मांगकर दी गालियां

पुणे: महाराष्ट्र के पुणे शहर से एक बेहद शर्मनाक और चिंता बढ़ाने वाली घटना सामने आई है। कारगिल युद्ध में देश के लिए लड़ चुके पूर्व सैनिक हकीमुद्दीन शेख के परिवार को ‘बांग्लादेशी’ बताकर अपमानित किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि चंदननगर इलाके में शनिवार देर रात करीब 80 लोगों की भीड़ ने उनके भाई इरशाद शेख के घर पर धावा बोल दिया, महिलाओं और बच्चों तक से भारतीय होने के सबूत मांगने लगे और उन्हें गालियां देकर धमकाया।

कौन हैं हकीमुद्दीन शेख?

हकीमुद्दीन शेख भारतीय सेना की इंजीनियर्स रेजिमेंट में हवलदार पद पर तैनात थे और 1999 के कारगिल युद्ध में वीरता से लड़े। वे वर्ष 2000 में सेना से सेवानिवृत्त हुए और वर्तमान में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में रहते हैं। उनका परिवार वर्षों से पुणे के चंदननगर क्षेत्र में निवास कर रहा है, जहां उनके छोटे भाई इरशाद शेख 60 सालों से परिवार सहित रह रहे हैं।

आधी रात का आतंक

घटना शनिवार रात लगभग 12 बजे की है। पीड़ित परिवार के अनुसार, “करीब 80 लोगों की भीड़ ने हमारे घर पर हमला किया, दरवाजा पीटा और घर में घुसकर आधार कार्ड व अन्य दस्तावेज मांगने लगे। जब हमने सभी वैध दस्तावेज दिखाए तो उन्हें फर्जी करार दिया गया। महिलाओं और बच्चों तक से पहचान के सबूत मांगे गए और बार-बार हमें ‘बांग्लादेशी’ कहा गया।” पीड़ितों का यह भी आरोप है कि हमलावर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाकर उन्हें डराने की कोशिश कर रहे थे।

इरशाद शेख ने बताया, “हमारा परिवार तीन पीढ़ियों से पुणे में रह रहा है। हमारे एक चाचा 1971 के युद्ध में घायल हुए थे, जबकि दूसरे चाचा 1965 में परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद के साथ लड़े थे। फिर भी हमसे देशभक्ति का सबूत मांगा जा रहा है।”

पुलिस पर भी सवाल

परिवार का दावा है कि घटना के वक्त दो पुलिसकर्मी सादी वर्दी में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जब पीड़ित परिवार शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचा, तो उन्हें घंटों बैठाया गया और सुबह आने को कहा गया।

हालांकि, पुलिस उपायुक्त सोमय मुंडे ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा, “भीड़ जैसी कोई घटना नहीं हुई। पुलिस अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर दस्तावेज जांच कर रही थी, लेकिन किसी तरह की गड़बड़ी नहीं पाई गई।”

मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया

‘नेशनल कॉन्फ्रेंस फॉर माइनॉरिटी’ के अध्यक्ष राहुल दंबले ने इस घटना को पूर्व सैनिक के परिवार को डराने और अपमानित करने की साजिश बताया है। उन्होंने FIR दर्ज कराए जाने और पुलिस आयुक्त से औपचारिक शिकायत करने की बात कही है।

सवाल खड़े करता है यह मामला

देश के लिए जान की बाजी लगाने वाले सैनिक के परिवार को जब यूं भीड़ के गुस्से और प्रशासन की अनदेखी का सामना करना पड़े, तो यह न सिर्फ समाज के लिए शर्मनाक है बल्कि देशभक्ति और नागरिक अधिकारों पर भी बड़ा सवाल उठाता है। क्या अब देशप्रेम का सबूत देना भी दस्तावेजों पर निर्भर हो गया है?

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