भोकरदन: पारध में हिडिंबा देवी की ऐतिहासिक यात्रा शुरू, धार्मिक परंपरा और इतिहास

भोकरदन • खासदार टाईम्स वृत्तसेवा
भोकरदन तालुका के पारध बु. में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपरा और आस्था की विरासत को संजोए हिडिंबा देवी की ऐतिहासिक यात्रा का शुभारंभ भाद्रपद माह की शुक्ल प्रतिपदा, शनिवार से हो रहा है। हिडिंबा देवी के दर्शन के लिए पारध सहित आसपास के क्षेत्रों और पड़ोसी जिलों से हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यात्रा के चलते पारध नगरी में सुबह से ही भक्तिमय माहौल बना हुआ है।
यात्रा के शुभारंभ के अवसर पर पारंपरिक विधि-विधान के साथ हिडिंबा देवी यानी राक्षसिणी की पूजा की जाएगी। देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। दिनभर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। हिडिंबा देवी के दर्शन के साथ ही श्रद्धालु महर्षि पराशर महाराज मंदिर में भी दर्शन के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
उत्सव के दौरान हिडिंबा देवी की विधिवत पूजा, आरती तथा भव्य पालखी शोभायात्रा का आयोजन किया जाएगा। पालखी शोभायात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और देवी के जयघोष के बीच यह धार्मिक आयोजन संपन्न होगा।
स्थानीय भजनी मंडलियों, भारुड दलों तथा महिला और पुरुष मंडलियों की ओर से विभिन्न पारंपरिक कलाओं की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। इससे धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ स्थानीय लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक भी श्रद्धालुओं को देखने को मिलेगी।
हिडिंबा माता की यात्रा का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हर वर्ष यात्रा के अवसर पर क्षेत्र के नागरिक, रिश्तेदार और श्रद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं, जिससे पारध नगरी में उत्साह का माहौल बन जाता है।
कई वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को ग्रामवासियों ने आज भी कायम रखा है। धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
सैकड़ों वर्षों की आस्था का प्रतीक है पारध की हिडिंबा देवी, महाभारत की हिडिंबा से जुड़ी है लोकमान्यता
जालना जिले के भोकरदन तालुका का पारध बु. गांव धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। गांव में स्थित हिडिंबा देवी का प्राचीन धार्मिक स्थल वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। भाद्रपद माह की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाली हिडिंबा देवी की वार्षिक यात्रा के दौरान पारध ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों और पड़ोसी जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
पारध की हिडिंबा देवी को लेकर स्थानीय क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय श्रद्धालु देवी को महाभारत की हिडिंबा से जोड़कर देखते हैं। महाभारत की कथा में हिडिंबा का उल्लेख भीमसेन की पत्नी और घटोत्कच की माता के रूप में मिलता है। इसी धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास के आधार पर पारध में हिडिंबा देवी को शक्ति स्वरूप मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
हालांकि, पारध स्थित हिडिंबा देवी मंदिर को सीधे महाभारत काल से जोड़ने वाली निश्चित ऐतिहासिक तिथि या पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इस संबंध को स्थानीय लोकमान्यता और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है। यही लोकविश्वास आज भी इस धार्मिक स्थल की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।
सैकड़ों वर्षों से चली आ रही आस्था
पारध में हिडिंबा देवी की उपासना को स्थानीय स्तर पर सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा माना जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी गांव के लोगों ने देवी की पूजा, यात्रा और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा को कायम रखा है। समय बदला, गांव और आसपास के क्षेत्र का स्वरूप बदला, लेकिन देवी के प्रति श्रद्धा और यात्रा की परंपरा आज भी कायम है।
यात्रा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पारध की सामूहिक सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। यात्रा के दौरान गांव में दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत किया जाता है। परिवार, रिश्तेदार और ग्रामीण एक साथ एकत्र होते हैं और पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है।
भाद्रपद की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है उत्सव
भाद्रपद माह की शुक्ल प्रतिपदा का दिन हिडिंबा देवी यात्रा के लिए विशेष महत्व रखता है। यात्रा के प्रारंभ के अवसर पर देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक विधियों के बाद आरती और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो जाती है। देवी के दर्शन और आशीर्वाद के लिए महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार देवी के दर्शन करने हर वर्ष पारध आते हैं।
पालखी शोभायात्रा बनती है आकर्षण का केंद्र
हिडिंबा देवी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक हिस्सा भव्य पालखी शोभायात्रा होती है। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवी की पालखी निकाली जाती है। पालखी के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, देवी के जयघोष और भक्ति गीतों के बीच पालखी शोभायात्रा का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालु देवी का जयघोष करते हुए पालखी के साथ चलते हैं। इस दौरान गांव की गलियां भी धार्मिक उत्साह से भर जाती हैं।
भजन, भारुड और लोककला की परंपरा
हिडिंबा देवी यात्रा की विशेषता केवल पूजा और पालखी तक सीमित नहीं है। यात्रा के दौरान स्थानीय भजनी मंडलियों, भारुड दलों तथा महिला और पुरुष मंडलियों द्वारा पारंपरिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक संदेश के साथ-साथ स्थानीय लोककला और ग्रामीण संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। पारंपरिक गीत, भजन, भारुड और वाद्ययंत्रों की प्रस्तुतियां यात्रा को धार्मिक उत्सव के साथ-साथ सांस्कृतिक समारोह का रूप देती हैं।
यह परंपरा खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण महाराष्ट्र की अनेक लोककलाएं आधुनिक मनोरंजन के दौर में धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। ऐसे में पारध की यात्रा जैसी परंपराएं स्थानीय लोककला को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
हिडिंबा देवी के साथ पराशर महाराज की भी आस्था
पारध की धार्मिक पहचान में हिडिंबा देवी के साथ महर्षि पराशर महाराज का धार्मिक स्थल भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यात्रा के दौरान देवी के दर्शन के साथ श्रद्धालु पराशर महाराज के मंदिर में भी दर्शन करते हैं।
इस कारण पारध की धार्मिक परंपरा में हिडिंबा देवी और पराशर महाराज दोनों स्थलों का विशेष स्थान है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की आवाजाही दोनों धार्मिक स्थलों पर दिखाई देती है।
महर्षि पराशर भारतीय धार्मिक और वैदिक परंपरा में महत्वपूर्ण ऋषि माने जाते हैं। पारध में उनसे जुड़ा धार्मिक स्थल स्थानीय श्रद्धा और परंपरा का एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र है।
भोकरदन क्षेत्र की प्राचीन पृष्ठभूमि
पारध की धार्मिक परंपरा को समझने के लिए भोकरदन क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भोकरदन का प्राचीन नाम भोगवर्धन माना जाता है और यह क्षेत्र प्राचीन काल में महत्वपूर्ण बस्ती और व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता था।
भोकरदन क्षेत्र में पुरातात्विक उत्खननों से प्राचीन सभ्यता और विभिन्न ऐतिहासिक कालों से जुड़े अवशेष मिलने की जानकारी मिलती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान भोकरदन क्षेत्र का इतिहास काफी पुराना है।
हालांकि, भोकरदन क्षेत्र के प्राचीन पुरातात्विक इतिहास और पारध की हिडिंबा देवी परंपरा के बीच सीधा ऐतिहासिक संबंध स्थापित करने के लिए अलग से प्रमाण आवश्यक हैं। दोनों को जोड़ने वाली बातें मुख्य रूप से स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के स्तर पर देखी जाती हैं।
आस्था से सामाजिक एकता तक
हिडिंबा देवी की यात्रा पारध के सामाजिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वर्षभर अलग-अलग स्थानों पर रहने वाले परिवारों के सदस्य और रिश्तेदार यात्रा के अवसर पर अपने गांव पहुंचते हैं। इससे आपसी मेल-मिलाप बढ़ता है और पुरानी सामाजिक परंपराएं मजबूत होती हैं।
यात्रा के दौरान गांव में मेले जैसा माहौल बनता है। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी उत्सव में भाग लेते हैं। धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी चलती रहती हैं।
यही वजह है कि हिडिंबा देवी यात्रा को केवल मंदिर और पूजा तक सीमित धार्मिक आयोजन नहीं माना जाता। यह पारध और आसपास के ग्रामीण समाज की सामूहिक आस्था, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा उत्सव बन चुका है।
नई पीढ़ी तक पहुंच रही विरासत
पारध के ग्रामीणों के लिए हिडिंबा देवी की यात्रा केवल वर्तमान का उत्सव नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है। बुजुर्गों से सुनी गई देवी की कथाएं, पूजा की परंपराएं, पालखी, भजन और लोककलाएं आज भी नई पीढ़ी को इस धार्मिक विरासत से जोड़ती हैं।
आधुनिक दौर में धार्मिक और लोकपरंपराओं के स्वरूप में बदलाव आ रहा है, लेकिन पारध में हिडिंबा देवी की यात्रा ने अपनी पारंपरिक पहचान काफी हद तक बनाए रखी है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
इतिहास, आस्था और लोकविश्वास का संगम
पारध बु. की हिडिंबा देवी यात्रा को यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह इतिहास, धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और ग्रामीण संस्कृति का संगम दिखाई देती है। हिडिंबा देवी को महाभारत की हिडिंबा से जोड़ने वाली मान्यता इस यात्रा को धार्मिक और पौराणिक पहचान देती है, जबकि सदियों से चली आ रही पूजा-पद्धति और यात्रा की परंपरा इसे स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का रूप देती है।
मंदिर की स्थापना का निश्चित कालखंड या यात्रा की शुरुआत का प्रमाणित वर्ष आज भी शोध का विषय है। यदि मंदिर परिसर के पुराने अभिलेख, शिलालेख, दस्तावेज और स्थानीय बुजुर्गों की मौखिक परंपराओं का व्यवस्थित अध्ययन किया जाए, तो पारध की हिडिंबा देवी परंपरा के इतिहास की कई महत्वपूर्ण कड़ियां सामने आ सकती हैं।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि पारध की हिडिंबा देवी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की आस्था, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक हैं। हर वर्ष लगने वाली यात्रा इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए हजारों श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ती है।
