दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन, गोवा में हृदयाघात से ली अंतिम सांस

गोवा | खासदार टाईम्स वृत्तसेवा
भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर पर हृदयाघात के बाद अंतिम सांस ली। अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें तत्काल मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर से मराठी और हिंदी फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
नाना पाटेकर के बेटे मल्हार पाटेकर ने उनके निधन की जानकारी दी। नाना पाटेकर के अचानक निधन से उनके प्रशंसकों और मनोरंजन जगत को गहरा सदमा लगा है। करीब पांच दशक लंबे अपने अभिनय करियर में नाना पाटेकर ने रंगमंच से लेकर मराठी और हिंदी सिनेमा तक अपनी अलग और बेहद प्रभावशाली पहचान बनाई।
नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा के उन चुनिंदा अभिनेताओं में गिना जाता है, जिन्होंने अपने दमदार अभिनय, प्रभावशाली आवाज और संवाद अदायगी से पर्दे पर निभाए हर किरदार को यादगार बना दिया। उनके निधन से मनोरंजन जगत ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसकी अभिनय शैली की अपनी अलग पहचान थी।
रंगमंच से शुरू हुआ अभिनय का सफर
नाना पाटेकर की अभिनय प्रतिभा की जड़ें रंगमंच से जुड़ी थीं। शुरुआती दौर में उन्होंने मराठी रंगमंच पर काम किया और कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। ‘पुरुष’ नाटक में गुलाबराव तथा ‘हमीदाबाई की कोठी’ में सत्तार अजरामत जैसे किरदारों के जरिए उन्होंने रंगमंच पर अपनी मजबूत पहचान बनाई।
रंगमंच पर अपनी प्रतिभा साबित करने के बाद नाना पाटेकर ने फिल्मों का रुख किया। वर्ष 1978 में प्रदर्शित फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें छोटी-छोटी भूमिकाएं मिलीं। ‘गिद्ध’, ‘भालू’ और ‘शीला’ जैसी फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें तत्काल बड़ी सफलता नहीं मिली।
कई वर्षों तक संघर्ष करने के बाद नाना पाटेकर को धीरे-धीरे बड़े अवसर मिलने लगे। राज बब्बर अभिनीत ‘आज की आवाज’ में उन्होंने सहायक भूमिका निभाई। उनके अभिनय की सराहना हुई, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी।
‘अंकुश’ ने बदली करियर की दिशा
वर्ष 1986 में आई फिल्म ‘अंकुश’ नाना पाटेकर के करियर में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। एन. चंद्रा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने बेरोजगारी और सामाजिक परिस्थितियों से परेशान एक सीधे-सादे युवक की भूमिका निभाई।
इस किरदार को नाना पाटेकर ने इतनी प्रभावशाली ढंग से निभाया कि वे दर्शकों और फिल्म समीक्षकों के बीच चर्चा का विषय बन गए। इसके बाद उनके पास महत्वपूर्ण भूमिकाओं के अवसर आने लगे।
वर्ष 1987 में आई ‘प्रतिघात’ में भी उनकी भूमिका को दर्शकों ने पसंद किया। भूमिका छोटी होने के बावजूद नाना पाटेकर ने अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी।
‘सलाम बॉम्बे!’ और ‘परिंदा’ से मिली बड़ी पहचान
वर्ष 1988 में आई ‘सलाम बॉम्बे!’ ने नाना पाटेकर की प्रतिभा को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद वर्ष 1989 में प्रदर्शित ‘परिंदा’ उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई।
‘परिंदा’ में उन्होंने अन्ना नाम के खतरनाक किरदार को बेहद प्रभावशाली अंदाज में निभाया। उनके अभिनय की जमकर सराहना हुई और इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तथा फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नाना पाटेकर की खासियत यह थी कि वे अपने किरदार को केवल संवादों तक सीमित नहीं रखते थे। वे किरदार की मानसिकता, भावनाओं और आक्रोश को अपने अभिनय के जरिए पर्दे पर जीवंत कर देते थे। उनकी भारी आवाज और संवाद बोलने की अनोखी शैली उनकी पहचान बन गई।
‘तिरंगा’ से घर-घर पहुंचे नाना पाटेकर
वर्ष 1992 में आई ‘तिरंगा’ फिल्म ने नाना पाटेकर को देशभर के दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। फिल्म में उनके दमदार संवाद और अभिनय ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।
इसके बाद नाना पाटेकर ने एक के बाद एक कई यादगार फिल्मों में काम किया। ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा साबित की।
विशेष रूप से ‘क्रांतिवीर’ में उनके अभिनय को बेहद सराहा गया। सामाजिक अन्याय और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले किरदार में उन्होंने दर्शकों के बीच जबरदस्त प्रभाव पैदा किया।
केवल अभिनेता नहीं, निर्देशक भी थे नाना
नाना पाटेकर ने अभिनय के साथ निर्देशन में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ फिल्म का निर्देशन किया। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया और निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली।
उनके करियर की खास बात रही कि उन्होंने केवल नायक की भूमिकाओं तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने खलनायक, चरित्र अभिनेता, गंभीर सामाजिक किरदार और हास्य भूमिकाओं सहित विभिन्न प्रकार के किरदार निभाए।
सामाजिक कार्यों से भी जुड़ा रहा नाम
नाना पाटेकर का जुड़ाव सामाजिक कार्यों से भी रहा। सितंबर 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की।
इस संस्था के माध्यम से महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए काम किया गया। विशेष रूप से आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की मदद और ग्रामीण क्षेत्रों में राहत कार्यों के लिए संस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नाना पाटेकर ने अपने सामाजिक कार्यों के जरिए यह संदेश भी दिया कि एक कलाकार की जिम्मेदारी केवल पर्दे तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज के जरूरतमंद लोगों के साथ खड़ा होना भी जरूरी है।
मनोरंजन जगत में शोक की लहर
नाना पाटेकर के निधन से मराठी और हिंदी फिल्म उद्योग को गहरा आघात लगा है। रंगमंच से शुरू हुई उनकी यात्रा भारतीय सिनेमा के एक बेहद प्रभावशाली अभिनेता तक पहुंची।
अपनी दमदार आवाज, तीखे संवाद, प्रभावशाली अभिनय और सामाजिक सरोकारों के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर ने भारतीय सिनेमा में अपनी ऐसी छाप छोड़ी है, जिसे लंबे समय तक भुलाया नहीं जा सकेगा। उनके अचानक निधन से फिल्म जगत और उनके प्रशंसकों के बीच शोक की लहर है।