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पहलगाम हमला: असली गुनहगार बच रहे हैं, देश को नफरत में झोंका जा रहा है!

Writer: Feroz Aashiq

पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर इस देश की हकीकत को उजागर कर दिया—हमारे नेताओं की नाकामी, खुफिया एजेंसियों की विफलता और मीडिया की बिकाऊ मानसिकता। आतंकवादी सीमा पार से आए, हमला किया, निर्दोषों का खून बहाया, और सवाल उठने चाहिए थे कि यह कैसे हुआ? मगर देश को असली मुद्दों से भटकाकर फिर वही पुराना खेल खेला जा रहा है—नाम पूछो, धर्म देखो, नफरत फैलाओ।

किसी ने सवाल नहीं उठाया कि:

  • जब सीमाओं पर करोड़ों-करोड़ों के उपकरण लगे हैं, तो आतंकवादी घुस कैसे आए?
  • हमारे खुफिया तंत्र, जिन पर हर साल अरबों रुपये खर्च होते हैं, वे क्या कर रहे थे?
  • जिन एजेंसियों को आतंकी मूवमेंट की भनक तक नहीं लगी, उनकी जवाबदेही तय होगी या नहीं?
  • क्या यह खुला इंटेलिजेंस फेलियर नहीं है?

क्यों नहीं पूछा जा रहा कि गृह मंत्रालय क्या कर रहा था?
जब देश के गृहमंत्री रैलियों में व्यस्त हों, जब सरकार का सारा ध्यान चुनावी राजनीति और प्रोपेगैंडा फैलाने पर हो, तो सुरक्षा तंत्र की हालत का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
क्या गृहमंत्री सिर्फ़ फूलमालाएं पहनने और नारे लगाने के लिए हैं? आतंकवाद रोकने की जिम्मेदारी उनकी नहीं?

मगर क्या हो रहा है?
गोदी मीडिया ने फरमान जारी कर दिया है—’धर्म देखो, सवाल मत पूछो।’
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की फैक्ट्री फुल स्पीड पर चल रही है—’हिंदू-मुस्लिम करो, सरकार से सवाल मत करो।’

गुस्सा किस पर निकाला जा रहा है?
भारतीय मुसलमानों पर!
उन मुसलमानों पर जो इसी देश के नागरिक हैं, जिन्होंने देश के लिए कुर्बानियां दी हैं, जिन्होंने आतंकवाद को जितना लानत दी है, उतना ही नुकसान उठाया भी है।
उनका कसूर सिर्फ़ इतना है कि वे मुसलमान हैं?

और पाकिस्तान के खिलाफ?
सरकार का रवैया एकदम ढीला है।
हर आतंकी हमले के बाद मीडिया में ऊंचे सुर में गालियां दी जाती हैं, दिखावे के बयान आते हैं, मगर असली जवाबी कार्रवाई न के बराबर होती है।
क्यों?
क्या डर है?
क्या सिर्फ़ अपनी जनता को गुमराह करना आसान है, असली दुश्मन से टकराना मुश्किल?

सच्चाई यह है कि:

  • सरकार की कूटनीति फेल हो चुकी है।
  • सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय की कमी है।
  • राजनीतिक सत्ता सिर्फ़ नफरत का खेल खेल रही है ताकि असली जिम्मेदारी से बच सके।

अब सवाल यह है:
क्या हम हर बार इस चाल में फंसते रहेंगे?
हर हमले के बाद हिंदू-मुसलमान का झगड़ा कराएंगे?
हर बार सरकार की नाकामी को ढकने के लिए नफरत की नई लहर उठने देंगे?

अगर हम सच में देशभक्त हैं, तो आज हमें पूछना पड़ेगा:

  • आतंकवादी आए कैसे?
  • सुरक्षा तंत्र फेल क्यों हुआ?
  • सरकार कब तक सिर्फ़ बयान देती रहेगी?
  • कब असली जवाबी कार्रवाई होगी?

और सबसे जरूरी:
हमें यह समझना होगा कि आतंकवाद से लड़ाई हिंदू बनाम मुसलमान नहीं है,
बल्कि भारत बनाम आतंकवाद है।
अगर हम इस बुनियादी सच्चाई को नहीं समझे, तो आतंकवादी अपना मकसद बिना एक गोली चलाए पूरा कर लेंगे—भारत को भीतर से तोड़ देना।

आज अगर हम सवाल नहीं पूछेंगे, तो कल हम अपने ही देश को नफरत की आग में जलता हुआ देखेंगे।
और तब कोई सीमा सुरक्षा, कोई सेना, कोई सरकार हमें बचा नहीं पाएगी।

अब भी वक्त है—धर्म नहीं, गुनाह देखो। धर्म नहीं, नाकामी देखो। धर्म नहीं, देश देखो।

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