टीपू सुल्तान: संघर्ष, सुधार और समकालीन विवाद का बहुआयामी इतिहास

खासदार टाईम्स/संपादकीय
टीपू सुल्तान (1750–1799), जिन्हें इतिहास में “मैसूर का शेर” कहा जाता है, 18वीं सदी के भारत के उन शासकों में शामिल थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की बढ़ती ताकत को खुली चुनौती दी। वे केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि तकनीकी नवाचार, आर्थिक सुधार, प्रशासनिक पुनर्गठन और कूटनीतिक सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं।
उनका जीवन जहां वीरता और दूरदृष्टि का प्रतीक है, वहीं आज का राजनीतिक परिदृश्य उनके नाम को लेकर गहरे वैचारिक मतभेदों का साक्षी है।
सैन्य कौशल और रॉकेट तकनीक का अनोखा प्रयोग
टीपू सुल्तान ने अपने पिता हैदर अली से विरासत में मिली सैन्य शक्ति को आधुनिक स्वरूप दिया। उन्होंने युद्ध में लोहे के खोल वाले ‘मैसूरी रॉकेट्स’ का उपयोग किया, जो उस दौर में अभूतपूर्व तकनीकी उपलब्धि थी। इन रॉकेटों ने अंग्रेजी सेना को चौंका दिया। बाद में ब्रिटेन ने इन्हीं तकनीकों का अध्ययन कर अपने रॉकेट विकसित किए।
उन्होंने अपनी सेना को यूरोपीय शैली में प्रशिक्षित किया, फ्रांसीसी सैन्य विशेषज्ञों की मदद ली और एक संगठित नौसेना स्थापित करने का प्रयास किया। उनका लक्ष्य स्पष्ट था—ब्रिटिश विस्तारवाद को रोकना और दक्षिण भारत में स्वायत्त सत्ता कायम रखना।
अंग्रेजों से चार निर्णायक युद्ध
टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच चार ऐतिहासिक अंग्लो-मैसूर युद्ध हुए। पहले तीन युद्धों में उन्होंने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी और कई बार समझौतों के जरिए अपनी सत्ता को सुरक्षित रखा।
1799 में चौथे युद्ध के दौरान श्रीरंगपट्टनम किला में लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय युद्धभूमि में प्राण देना स्वीकार किया। उनका यह बलिदान भारतीय प्रतिरोध की मिसाल बन गया।
आर्थिक दृष्टि और वैश्विक व्यापार नीति
टीपू सुल्तान ने समझ लिया था कि केवल सैन्य शक्ति से राज्य मजबूत नहीं होता, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी आवश्यक है।
- उन्होंने विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए तुर्की, अफगानिस्तान और फ्रांस में दूत भेजे।
- मैसूर के प्रसिद्ध रेशम उद्योग की नींव रखी और चीन से रेशम के कीट मंगवाकर स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू कराया।
- नई मुद्रा प्रणाली लागू की और अपना अलग कैलेंडर शुरू किया।
- राज्य के नियंत्रण में व्यापारिक संस्थाएं स्थापित कर राजस्व बढ़ाने का प्रयास किया।
उनकी नीतियां उस समय के लिए अत्यंत प्रगतिशील मानी जाती हैं।
कृषि और सिंचाई सुधार
टीपू सुल्तान ने भूमि सुधारों पर जोर दिया। किसानों को कर्ज उपलब्ध कराया और सिंचाई के लिए नहरों व जलाशयों का निर्माण करवाया।
जहां आज कृष्णराज सागर बांध स्थित है, उस क्षेत्र में प्रारंभिक जल प्रबंधन की अवधारणा उनके शासनकाल से जुड़ी मानी जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि वे दीर्घकालिक विकास की सोच रखते थे।
धार्मिक और सामाजिक पहल
टीपू सुल्तान को लेकर इतिहास में मतभेद रहे हैं, लेकिन यह भी तथ्य है कि उन्होंने कई धार्मिक संस्थानों को संरक्षण दिया।
जब शृंगेरी मठ पर हमला हुआ, तब उन्होंने मठ के पुनर्निर्माण और देवी शारदा की प्रतिमा के लिए आर्थिक सहायता भेजी। उनके प्रशासन में हिंदू अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे।
हालांकि, कुछ क्षेत्रों में उनकी नीतियों को लेकर विवाद भी रहे, जिन पर इतिहासकारों में आज भी बहस जारी है।
कला, स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत
टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम में भव्य इमारतों और उद्यानों का निर्माण कराया। दरिया दौलत बाग और गुंबज जैसे स्थापत्य आज भी उनकी सांस्कृतिक दृष्टि के प्रमाण हैं। उनकी वास्तुकला में हिंदू और इस्लामी शैलियों का संगम दिखाई देता है, जो उस समय की साझा सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
मालेगांव में टीपू सुल्तान के फोटो को लेकर विवाद
हाल के दिनों में मालेगांव की मेयर द्वारा महानगर पालिका कार्यालय में टीपू सुल्तान का फोटो लगाए जाने के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है।
भारतीय जनता पार्टी और कई हिंदू संगठनों ने इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि टीपू सुल्तान का इतिहास विवादित रहा है और उन्हें सरकारी भवन में स्थान देना उचित नहीं।
दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि वे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले एक शूरवीर शासक थे और उनकी उपलब्धियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह विवाद अब केवल एक तस्वीर का नहीं, बल्कि इतिहास की व्याख्या, विचारधारा और राजनीतिक दृष्टिकोण के टकराव का प्रतीक बन गया है।
निष्कर्ष: इतिहास का नायक या विवाद का केंद्र?
टीपू सुल्तान का व्यक्तित्व सरल रेखाओं में नहीं बांधा जा सकता। वे एक साहसी योद्धा, तकनीकी नवप्रवर्तक, आर्थिक सुधारक और दूरदर्शी प्रशासक थे।
साथ ही, उनके शासन और नीतियों को लेकर इतिहास में मतभेद भी रहे हैं।
आज जब उनका नाम राजनीतिक बहसों में गूंजता है, तो यह स्पष्ट होता है कि इतिहास केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान की विचारधाराओं का भी आईना है।
टीपू सुल्तान की विरासत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने अतीत को किस नजरिए से देखते हैं—संघर्ष की प्रेरणा के रूप में या विवाद के आधार के रूप में।
