कुर्बानी का असली पैग़ाम: त्याग, तक़वा और इंसानियत की रूह — मौलाना सोहेल नदवी

जालना / कादरी हुसैन
ईद-उल-अज़हा केवल जानवर की कुर्बानी का नाम नहीं, बल्कि यह इंसान के अंदर त्याग, समर्पण, तक़वा और अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने की भावना पैदा करने का पैग़ाम है। यह विचार प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना सोहेल नदवी ने अपने विशेष संदेश में व्यक्त किए।
मौलाना सोहेल नदवी, जो दारुल उलूम ज़कारिया के नाज़िम, अमारते शरिया जालना के नखीब तथा जमीयत उलेमा मराठवाड़ा के उपाध्यक्ष हैं, उन्होंने कहा कि इस्लाम की हर इबादत त्याग और बलिदान का संदेश देती है। नमाज़ आत्मिक इच्छाओं का त्याग है, ज़कात माल का बलिदान है और हज इंसान को हर तरह की कुर्बानी का सबक देता है।
उन्होंने कहा कि ईद-उल-अज़हा की असली रूह हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत इस्माइल (अ.स.) की उस महान कुर्बानी से जुड़ी है, जब अल्लाह के हुक्म पर एक पिता अपने जिगर के टुकड़े को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गया। यह सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि इंसानियत के लिए सब्र, वफ़ादारी और अल्लाह की मोहब्बत का सबसे बड़ा पैग़ाम है।
मौलाना ने कहा कि कुर्बानी का मक़सद केवल जानवर ज़बह करना नहीं, बल्कि अपने अहंकार, लालच, बुरी ख्वाहिशों और दुनियावी दिखावे को अल्लाह की राह में कुर्बान करना है। अगर इंसान के अंदर तक़वा, नेकनीयती और इखलास पैदा नहीं होता तो कुर्बानी महज़ एक रस्म बनकर रह जाती है।
उन्होंने कहा कि आज समाज में दिखावे और शौहरत के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां करने का रिवाज बढ़ता जा रहा है, जबकि अल्लाह के यहां अमल की कीमत उसकी नीयत से होती है। कुरान की आयत का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि “अल्लाह तक न उनका गोश्त पहुँचता है और न खून, बल्कि तुम्हारा तक़वा पहुँचता है।”
मौलाना सोहेल नदवी ने कहा कि ईद-उल-अज़हा मुसलमानों को यह संदेश देती है कि अगर अल्लाह, धर्म, समाज और इंसानियत के लिए किसी भी प्रकार की कुर्बानी देनी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की कि कुर्बानी को केवल रस्म या खाने-खिलाने तक सीमित न रखें, बल्कि इसके असली मक़सद — त्याग, इंसानियत, तक़वा और अल्लाह की रज़ामंदी — को अपनी ज़िंदगी में अपनाएं।
