भिडे के फिर जागे सुलेमानी कीड़े: कहा– “सर्वधर्म समभाव नपुंसकता है, लाल किले पर भगवा फहराने के लिए काम करें”

नाशिक— शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्थान के प्रमुख संभाजी भिडे एक बार फिर अपने विवादित बयानों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय प्रतीकों पर अपने तीखे विचार रखे, जिससे एक नया विवाद खड़ा हो गया है।
नाशिक में आयोजित एक कार्यक्रम में भिडे ने कहा, “सर्वधर्म समभाव यानी न तो पुरुष, न स्त्री — यह एक तरह की नपुंसकता है। जैसे पति-पत्नी के बीच की भूमिका नहीं बदली जा सकती, वैसे ही धर्मों के बीच समभाव भी संभव नहीं है।” उन्होंने इसे ‘पुसटपणा’ (कमजोरी) और ‘निचता’ करार दिया।
“आंबा खाकर संतान होती है” – बयान पर कायम
भिडे ने एक बार फिर अपने पुराने बयान का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि “आंबा खाकर संतान होती है”। उन्होंने कहा, “मैंने आंबा खाकर संतान होती है ऐसा कहा था, और मैंने एक आम का पेड़ लगाया है। वहां जाकर आज भी आंबे खा सकते हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस बयान को लेकर उन पर कोर्ट में केस चल रहा है।
“तिरंगा स्वीकार है, लेकिन भगवा हमारा मूल ध्वज”
अपने भाषण में भिडे ने यह भी कहा कि तिरंगा झंडा स्वतंत्रता प्राप्ति के समय स्वीकार किया गया था, और हम सभी को तिरंगे और संविधान का सम्मान करना चाहिए। लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा, “हजारों वर्षों से भगवा ध्वज हमारे राष्ट्र का प्रतीक रहा है। इसलिए हमें दिल्ली के लाल किले पर भगवा फहराने के लिए काम करना चाहिए।”
कार्यक्रम में भारी पुलिस बंदोबस्त
भिडे के कार्यक्रम के दौरान संभाजी ब्रिगेड द्वारा विरोध जताए जाने की आशंका के चलते पुलिस ने कड़ा बंदोबस्त किया था। विरोध की तैयारी में लगे कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पहले ही हिरासत में ले लिया था।
“स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराएं, लेकिन… ”
भिडे ने कहा, “15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाएं, तिरंगा फहराएं, लेकिन साथ ही हिरोजी फर्जंद ने जो कहा था, उस दिशा में भी काम करें।” उनका यह बयान राष्ट्रवाद और धार्मिक प्रतीकों को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।
भिडे के इन बयानों पर सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
