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जाति जनगणना पर चंद्रशेखर आजाद की प्रतिक्रिया: मोदी सरकार की मंशा पर जताया शक, कहा– सिर्फ बातें हो रही हैं, समयसीमा तय नहीं

जाति जनगणना को लेकर केंद्र सरकार द्वारा लिए गए हालिया फैसले पर आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने पहली बार प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सरकार की मंशा पर संदेह जताते हुए कहा कि इस पर केवल बातें की जा रही हैं, लेकिन कोई स्पष्ट कार्ययोजना या समयसीमा सामने नहीं आई है। चंद्रशेखर ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने लंबे समय से जाति जनगणना की मांग उठाई है, लेकिन अब सरकार इसे चुनावी मुद्दा बनाकर लोगों को गुमराह कर रही है।

“हमने सबसे पहले यह मांग उठाई थी”

चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि आजाद समाज पार्टी की ओर से सबसे पहले जाति जनगणना की मांग उठाई गई थी। उन्होंने कहा,

“3 फरवरी को लोकसभा सत्र के दौरान मैंने खुद यह मुद्दा संसद में उठाया था। इसके बाद दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में एक बड़े आंदोलन में भी हमारी पहली मांग यही थी। जब हमने सहारनपुर से लेकर 18 मंडलों में समीक्षा यात्रा की, तब भी जाति जनगणना सबसे अहम मुद्दा था।”

महत्वपूर्ण डेटा मिलेगा— चंद्रशेखर

आजाद ने जाति जनगणना की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इससे समाज में मौजूद असमानताओं को समझने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा,

“अगर यह जनगणना होती है तो हमें पता चलेगा कि किन वर्गों के पास कितनी शिक्षा, कितनी ज़मीन, कितनी नौकरियां हैं। यहां तक कि सामान्य वर्ग को भी इस जनगणना से स्पष्टता मिलेगी। यह डेटा नीति निर्माण के लिए बेहद जरूरी है।”

“अब तक सिर्फ बातें हुई हैं”

हालांकि चंद्रशेखर ने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अभी तक केवल घोषणाएं हुई हैं, ठोस कदम नहीं उठाए गए।

“सरकार ने न तो कोई समयसीमा तय की है, न ही यह बताया है कि जनगणना कब शुरू होगी और कौन से विषय शामिल किए जाएंगे। हम आशंका जता रहे हैं कि बिहार चुनाव तक इस पर बहस चलेगी और उसके बाद सरकार रुख बदल सकती है,” उन्होंने कहा।

1931 के बाद नहीं हुई जाति जनगणना

चंद्रशेखर ने यह भी कहा कि 1931 के बाद देश में कोई ठोस जाति जनगणना नहीं हुई है।

“ब्रिटिश शासन के दौरान 1931 में आखिरी जातिगत जनगणना हुई थी। उसके बाद आज तक किसी सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। जब तक जातिगत आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक पिछड़े, दलित और सामान्य वर्गों की स्थिति को लेकर अस्पष्टता बनी रहेगी।”

निष्कर्ष: राजनीति या सामाजिक सुधार?

चंद्रशेखर आजाद की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब केंद्र सरकार पर जाति जनगणना को चुनावी मुद्दा बनाने का आरोप लग रहा है। बिहार सरकार पहले ही अपनी ओर से जातिगत सर्वे करा चुकी है, और अब केंद्र पर भी जातिगत आंकड़ों को सार्वजनिक करने का दबाव बढ़ रहा है। लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं है और सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।

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