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पैरोल का ‘ब्रह्मास्त्र’! रेप और मर्डर का दोषी बाबा राम रहीम बना देश का ‘सबसे आज़ाद कैदी’?

रेप और मर्डर जैसे संगीन अपराधों में दोषी करार दिए गए डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर 40 दिन की पैरोल पर जेल से बाहर आ गया है। ये कोई पहली बार नहीं है — बल्कि ये सिलसिला अब इतना आम हो चला है कि मानो जेल सिर्फ नाम की पाबंदी बन गई हो, और सज़ा एक दिखावे का कानून।

375 दिन की ‘आज़ादी’, 2902 दिन की ‘सज़ा’

25 अगस्त 2017 को जब राम रहीम पहली बार दो साध्वियों के रेप मामले में दोषी ठहराए गए, तब उसे 20 साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद 2019 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या में भी उसे आजीवन कारावास मिला। लेकिन अगर आप आज, यानी 5 अगस्त 2025 तक की पूरी सजा की गिनती करें, तो राम रहीम ने कुल 2,902 दिन जेल में बिताए — लेकिन इनमें से 375 दिन वो पैरोल और फरलो पर ‘खुली हवा’ में रहा

यानी राम रहीम ने अपनी सजा का हर 8वां दिन जेल के बाहर मौज में काटा

2022 के बाद खुली ‘पैरोलों की पोटली’

2017 से 2021 तक उसे बमुश्किल इक्का-दुक्का मौकों पर कुछ दिनों की पैरोल मिली। लेकिन साल 2022 में हरियाणा सरकार ने ‘गुड कंडक्ट टेंपरेरी प्रिजनर्स एक्ट’ में संशोधन किया और फिर तो जैसे राम रहीम की किस्मत ही पलट गई।

तब से हर साल वह लगभग बिना नागा 91 दिनों की पैरोल और फरलो का ‘पैकेज’ लेता आ रहा है:

  • 2022 में 91 दिन
  • 2023 में 91 दिन
  • 2024 में 91 दिन
  • 2025 में अभी तक 91 में से 61 दिन पूरे

‘आज़ादी का रिकॉर्ड’ – जो कोई नहीं तोड़ पाया

देश की जेलों में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे 75,629 कैदी हैं। हरियाणा में ही 2,824 कैदी आजीवन कारावास झेल रहे हैं। लेकिन राम रहीम जैसा पैरोल का ट्रैक रिकॉर्ड किसी का नहीं

  • संजय दत्त को पूरी सजा के दौरान सिर्फ 160 दिन की पैरोल मिली।
  • मनु शर्मा को भी पैरोल पर नाइट क्लब में देखा गया तो उसकी रिहाई पर रोक लगा दी गई।
  • बिल्किस बानो केस के दोषियों को भी 1,000 दिन की पैरोल पर देशभर में सवाल खड़े हुए।

लेकिन राम रहीम की हर रिहाई को सरकार एक ‘रूटीन प्रोसेस’ बता देती है।

सवाल तो बनता है…

जब आम कैदियों को कोर्ट के आदेशों के बावजूद भी समय पर रिहाई नहीं मिलती, तो राम रहीम को क्यों बार-बार ‘छुट्टी’ दी जा रही है?

क्या ये सिर्फ ‘कानून की उदारता’ है, या फिर राजनीतिक लाभ की कोई खामोश कहानी है?

हरियाणा सरकार कहती है कि हर मुजरिम को पैरोल मिल सकती है, लेकिन सच ये है कि राम रहीम के अलावा किसी और को इतना नियमित, इतना सुनिश्चित और इतना लंबा छुट्टी पैकेज नहीं मिला।

निष्कर्ष: राम रहीम – जेल में नहीं, सिस्टम की जेब में!

इस देश में सजा सिर्फ कमजोरों के लिए है। प्रभावशाली, रसूखदार और वोट बैंक बन चुके मुजरिमों के लिए कानून सिर्फ एक औपचारिकता है। बाबा राम रहीम इसका ‘जीता-जागता सबूत’ है।

कभी श्रद्धा, कभी राजनीति, और कभी ‘अच्छे बर्ताव’ की आड़ में देश का एक सजायाफ्ता अपराधी साल-दर-साल सज़ा काटने की जगह छुट्टियां मना रहा है – और जनता सिर्फ सवाल कर रही है… जवाब कोई नहीं।

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