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औरंगाबाद: डीपीसी में बोगस वर्कऑर्डर का मामला, 100 करोड़ के कार्यों पर सवाल; जांच समिति गठित

औरंगाबाद/प्रतिनिधि 

औरंगाबाद में जिला नियोजन समिति (DPC) से मंजूर कार्यों में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया है। निर्माण विभाग द्वारा बोगस वर्कऑर्डर तैयार कर करोड़ों रुपये के कार्यों में अनियमितता किए जाने के संदेह पर जिलाधिकारी दिलीप स्वामी ने गुरुवार को मुख्य अभियंता अतुल चव्हाण की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की है। समिति को पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं।

गुरुवार को हुई डीपीसी बैठक में पालकमंत्री संजय शिरसाट ने यह मुद्दा उठाया कि क्यूआर कोड एक नाम से और वर्कऑर्डर दूसरे नाम से जारी किए जा रहे हैं। इस खुलासे के बाद चालू वित्तीय वर्ष में डीपीसी से निर्माण विभाग को स्थानांतरित लगभग 100 करोड़ रुपये के कार्य संदेह के घेरे में आ गए हैं। साथ ही, इससे पहले भी इस तरह की गड़बड़ी होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, इस कथित रैकेट के माध्यम से कुछ ठेकेदारों को बड़ा लाभ पहुंचा है। निर्माण विभाग के टेंडर क्लर्क, विभागीय लेखाधिकारी और कार्यकारी अभियंता सहित पूरी शृंखला के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही घोटाले की जड़ तक पहुंचा जा सकेगा। मामले के सामने आने के बाद कुछ ठेकेदार और अधिकारी संपर्क से बाहर बताए जा रहे हैं।

गुन्हे दर्ज करने के आदेश

पालकमंत्री संजय शिरसाट ने कहा कि कुछ बोगस क्यूआर कोड के माध्यम से शासन को धोखा दिए जाने का मामला सामने आया है। डीपीसी से स्वीकृत कार्यों में यह गड़बड़ी पाई गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच के बाद बोगस ऑर्डर और क्यूआर कोड का उपयोग कर गबन करने वालों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएंगे।

एक ऑर्डर संदिग्ध पाया गया

जिलाधिकारी दिलीप स्वामी ने बताया कि निर्माण विभाग की मंजूरी के बाद वर्कऑर्डर जारी होता है। डीपीसी बैठक में यह मुद्दा सामने आया कि एक ऑर्डर में क्यूआर कोड स्कैन करने पर अलग नाम दिखाई दे रहा था, जबकि वर्कऑर्डर किसी अन्य नाम से था। 10 से 12 ऑर्डरों की जांच में एक ऑर्डर संदिग्ध पाया गया है। इसी के आधार पर मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई है।

अधिकारों को लेकर नाराजगी

बैठक के दौरान अनुदान आवंटन के अधिकार को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी। जानकारी के अनुसार, यदि 31 मार्च से पहले पालकमंत्री उपलब्ध न हों, तो जिला नियोजन समिति के सदस्य सचिव के रूप में जिलाधिकारी को अनुदान संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है, ताकि राशि शासन को वापस न जाए। हालांकि, इस विषय पर गलत जानकारी दिए जाने के कारण बैठक में तीखी चर्चा हुई। बाद में पिछले तीन जिलाधिकारियों के कार्यकाल के अभिलेख प्रस्तुत किए जाने के बाद स्थिति शांत हुई। पालकमंत्री ने भविष्य में किसी भी निर्णय से पूर्व उन्हें अवगत कराने के निर्देश प्रशासन को दिए हैं।

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