औरंगाबाद: बाबा फर्जन के बंगले से करोड़ों की नकदी और हथियार मिलने पर सियासत तेज, नेताओं ने पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल

औरंगाबाद | खासदार टाईम्स वृत्तसेवा
औरंगाबाद पुलिस की अपराध शाखा द्वारा दो दिन पहले 1984 से 1990 के दशक के दौरान चर्चित रहे कथित डॉन बाबा फर्जन के बंगले पर की गई छापेमारी के बाद अब मामला राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। पुलिस ने इस कार्रवाई में लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपये नकद, बंदूकें, छह हजार कारतूस, तलवारें, गुप्तियां तथा अन्य घातक हथियार बरामद करने का दावा किया है। उल्लेखनीय है कि यह कार्रवाई बाबा फर्जन के निधन के लगभग एक माह बाद की गई।
इस मामले को लेकर महाराष्ट्र सरकार के पालकमंत्री संजय शिरसाट ने आरोप लगाया कि पुलिस बरामद नकदी की वास्तविक राशि छिपा रही है। वहीं शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता एवं विधायक अंबादास दानवे ने भी इस दावे का समर्थन करते हुए कहा कि बंगले से पांच करोड़ नहीं, बल्कि इससे कहीं अधिक नकदी मिली हो सकती है। दोनों नेताओं ने इस संबंध में पुलिस आयुक्त से भी चर्चा करने की बात कही है।
बाबा फर्जन 1980 और 1990 के दशक में औरंगाबाद के चर्चित नामों में शामिल थे। वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने औरंगाबाद पश्चिम सीट से शिवसेना उम्मीदवार चंद्रकांत खैरे के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था। हालांकि उन्हें उस चुनाव में केवल 6,009 वोट ही मिले थे।
बाबा फर्जन और शिवसेना के पुराने संबंधों को लेकर भी अब राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि जिस व्यक्ति ने कभी शिवसेना के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ा था, उसके मामले में अब शिवसेना के कई नेता पुलिस कार्रवाई पर सवाल क्यों उठा रहे हैं।
बताया जाता है कि 1984 से 1990 के बीच औरंगाबाद सांप्रदायिक तनाव और दंगों के कारण अत्यंत संवेदनशील शहर माना जाता था। वर्ष 1986 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान लोटाकारंजा क्षेत्र स्थित बाबा फर्जन के घर पर भी कथित रूप से हमला हुआ था। उस समय उन्होंने अपने पास मौजूद एयरगन से हवाई फायरिंग कर भीड़ को पीछे हटाया था। इसके बाद शहर में उनका प्रभाव बढ़ा और उनका नाम कई हिंदुत्ववादी संगठनों तथा नेताओं से जोड़ा जाने लगा। साथ ही उन्होंने श्रमिक संगठनों के माध्यम से भी अपना प्रभाव स्थापित किया था।
जानकारी के अनुसार, उस दौर में श्रमिक यूनियनों को लेकर बाबा फर्जन और तत्कालीन शिवसेना नेता एवं श्रमिक नेता सुभाष पाटील के बीच विवाद भी हुआ था, लेकिन बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया और दोनों संगठनों ने साथ काम किया। वर्ष 1986 के दंगों के बाद पुलिस कार्रवाई के दौरान चंद्रकांत खैरे, विनायक बावस्कर और बाबा फर्जन को गिरफ्तार किया गया था, जबकि सुभाष पाटील को बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत गिरफ्तार किया गया था।
बताया जाता है कि 1990 के विधानसभा चुनाव से पहले बाबा फर्जन ने शिवसेना से टिकट मांगा था, लेकिन टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। चुनाव में हार के बाद उन्होंने कथित रूप से अपने श्रमिक संगठन और हथियारों के कारोबार पर अधिक ध्यान दिया। यह भी दावा किया जाता है कि उनके पास बंदूक और कारतूस बेचने का वैध लाइसेंस था।
फिलहाल बाबा फर्जन के बंगले से बरामद नकदी और हथियारों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पालकमंत्री संजय शिरसाट, विधायक अंबादास दानवे तथा श्रमिक नेता सुभाष पाटील ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। वहीं सुभाष पाटील ने दावा किया है कि बंगले में 20 से 25 करोड़ रुपये तक की नकदी होने की चर्चा है। हालांकि पुलिस ने इस संबंध में आधिकारिक रूप से केवल अपनी बरामदगी का विवरण जारी किया है और मामले की जांच जारी है।
