Editorial

“हम मुस्लिम हैं या मुजरिम?” — नफ़रत के बाज़ार में इंसानियत की आवाज़

लेखक: सय्यद फेरोज़ आशिक

आज का भारत दो परतों में बँटा दिखाई देता है।
पहली परत — चमकती स्क्रीन पर चलती बहसें: पाकिस्तान, हिंदू गौरव, और “नए भारत” की कहानियाँ।
और दूसरी परत — वो खामोश सच्चाई जो कभी टीवी पर नहीं दिखती: मुसलमानों की लिंचिंग, जेलों में सड़ते निर्दोष, और नफ़रत की आग में झुलसती ज़िंदगियाँ।

विदेशी मीडिया में इस खामोश सच्चाई की गूँज अब खुलकर सुनाई दे रही है।
अल-जज़ीरा ने अपने लेख का शीर्षक रखा है — “हम मुस्लिम हैं या मुजरिम? नफ़रत कैसे भारत का रोज़मर्रा का मनोरंजन बन गई है।”
ये शीर्षक सिर्फ़ एक सवाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना के लिए आईना है।

भारत में अब नफ़रत सिर्फ़ एक भावना नहीं रही — यह एक प्रदर्शन बन चुकी है।
जब मुसलमानों को पीटा जाता है, अपमानित किया जाता है, या उनका व्यवसाय छीन लिया जाता है, तो समाज के एक हिस्से को यह एक “दृश्य”, एक “शो” लगता है — मानो किसी सीरियल की कड़ी हो, जो अगले दिन फिर दोहराई जाएगी।

आज़मगढ़ में सात साल के एक मासूम मुस्लिम बच्चे की हत्या हुई।
उसका शव एक थैले में भरा मिला — लेकिन कुछ ही घंटों में यह ख़बर चैनलों से गायब हो गई।
फिर वही शोर — “लव जिहाद”, “सीमा पर तनाव”, “क्रिकेट मैच”।
एक बच्चे की मौत इस देश की खबर नहीं बन सकी, क्योंकि वो गलत धर्म में पैदा हुआ था।

यह सामान्यीकरण भयावह है।
समाजशास्त्री स्टेनली कोहेन ने कहा था — जब अत्याचार बार-बार दोहराए जाते हैं, तो समाज उन्हें अस्वीकार नहीं करता, बल्कि उन्हें स्वीकारने की आदत डाल लेता है।
आज का भारत इसी अवस्था में है। मुसलमानों की हत्याएँ अब हैरान नहीं करतीं — वे बस एक “पृष्ठभूमि का शोर” बन गई हैं।

जब कानपुर में मुसलमानों ने “आई लव मुहम्मद” की तख्तियाँ उठाईं, तो पुलिस ने सुरक्षा देने के बजाय उन पर ही मामला दर्ज किया — 1,300 लोगों पर एफआईआर, सामूहिक गिरफ़्तारियाँ।
लेकिन जब महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश में भीड़ खुलेआम नरसंहार की मांग करती है, तो कैमरे या तो खामोश रहते हैं या भीड़ की भाषा को “राष्ट्रवाद” कह देते हैं।

इंदौर जैसे शहरों में “जिहादी-मुक्त बाज़ार” के नाम पर मुस्लिम दुकानदारों को रातोंरात खदेड़ दिया गया।
परिवारों की रोज़ी-रोटी छीन ली गई, बच्चे स्कूल छोड़ने पर मजबूर हुए, और महिलाएँ भूख से लड़ने लगीं।
राष्ट्रीय मीडिया ने इसे “कानून व्यवस्था की कार्रवाई” कहकर टाल दिया, जबकि सोशल मीडिया पर इसे “देशभक्ति” के उत्सव में बदल दिया गया।

आज मुसलमान बनकर जीना, एक स्थायी शक़ के घेरे में जीने जैसा है।
मस्जिद में निगाहें, बाज़ार में तिरस्कार, कक्षा में संदेह — हर जगह एक अदृश्य न्यायालय बैठा है, जहाँ मुसलमान पहले से अपराधी माना जाता है।
हर अज़ान किसी को उकसावे जैसी लगती है, जबकि वह तो बस एक प्रार्थना है — जीवन की धड़कन।

साहिर लुधियानवी ने पूछा था,
“जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहाँ हैं?”
आज वही सवाल फिर हमारे सामने खड़ा है।
अगर यही भारत की महानता है, तो उसे हर दिन एक मुसलमान की बेइज़्ज़ती क्यों चाहिए?

महमूद ममदानी ने लिखा था — “गुड मुस्लिम” और “बैड मुस्लिम” का फर्क़ समाज नहीं, सत्ता तय करती है।
जो मुसलमान अपनी पहचान छिपा लेता है, उसे “शांत” कहा जाता है।
जो अपनी पहचान पर गर्व करता है, बराबरी की माँग करता है, या “मैं मुहम्मद से प्यार करता हूँ” कहने की हिम्मत रखता है — उसे “खतरनाक” कह दिया जाता है।

यह धर्म का नहीं, सत्ता का खेल है —
कौन तय करेगा कि कौन वैध है, और कौन सज़ा का हकदार।


आज सवाल सिर्फ़ मुसलमानों का नहीं है।
सवाल यह है कि — क्या नफ़रत अब भारत की पहचान बन जाएगी?
या फिर यह देश, जो कभी “सारे जहाँ से अच्छा” गाता था, फिर से इंसानियत की आवाज़ सुनेगा?

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