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17 साल बाद भी नहीं मिला इंसाफ! मालेगांव ब्लास्ट केस के सभी आरोपी बरी, पीड़ितों का छलका दर्द

"जिन्हें बरी किया, उन्होंने बम नहीं फोड़ा तो किसने?" — मालेगांव पीड़ितों का कोर्ट पर सवाल

मालेगांव: 29 सितंबर 2008 को मालेगांव के भिक्खु चौक पर हुए दर्दनाक धमाके में 7 बेगुनाह लोगों की जान गई और 80 से ज्यादा घायल हुए। अब 17 साल बाद इस मामले में NIA की स्पेशल अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले ने पीड़ित परिवारों के ज़ख्म फिर से हरे कर दिए हैं। उनका कहना है – “हमें इंसाफ नहीं मिला, अगर इन्होंने ब्लास्ट नहीं किया तो फिर हमारी बच्चियों की मौत का जिम्मेदार कौन?”

वड़ा पाव लेने गई थी बेटी, लौटी लाश बनकर

धमाके में जान गंवाने वाली 10 साल की मासूम फरहीन उर्फ शगुफ्ता की कहानी रूह कंपा देती है। पिता लियाकत शेख ने बताया, “मेरी बच्ची वड़ा पाव लेने गई थी, लेकिन उसकी लाश लौटी। आज सिर्फ एक तस्वीर बची है और सवाल कि अगर ये आरोपी निर्दोष हैं, तो मेरी बच्ची को किसने मारा?” उन्होंने कोर्ट के फैसले को “एकदम गलत और अन्यायपूर्ण” करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात कही है।

“सबूतों को किया गया नजरअंदाज”

इसी धमाके में सैयद अजहर की भी जान गई थी। उनके पिता का कहना है, “हम 17 साल से इंसाफ के इंतजार में थे। लेकिन कोर्ट ने सारे सबूतों को दरकिनार कर दिया। ये फैसला हमारे ज़ख्मों पर नमक है। हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।”

कौन-कौन हुआ बरी?

NIA की विशेष अदालत ने जिन आरोपियों को बरी किया है, उनमें शामिल हैं:

  • साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर (पूर्व भाजपा सांसद)
  • लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित
  • रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय
  • सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर, सुधाकर धर द्विवेदी और समीर कुलकर्णी

कोर्ट ने कहा कि “अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका, इसलिए सबूतों के अभाव में सभी को बरी किया जाता है।”

देश दहला देने वाला ब्लास्ट

2008 में एक ही दिन महाराष्ट्र के मालेगांव और गुजरात के मोडासा में धमाके हुए थे। मालेगांव में 7 मौतें और 80 घायल, मोडासा में 15 वर्षीय लड़के की मौत हुई थी। कुछ ही दिनों बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित तीन लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। हेमंत करकरे के नेतृत्व में हुई जांच में आरोपियों पर गंभीर सबूत मिले थे। लेकिन 17 साल बाद, सभी को निर्दोष मान लिया गया।

पीड़ितों की एक ही मांग – “हमें हमारी बच्चियों का इंसाफ चाहिए”

यह फैसला न सिर्फ पीड़ित परिवारों के लिए झटका है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है जिसमें 17 साल बाद भी दोषी कौन था – ये तय नहीं हो पाया।


यह सिर्फ एक अदालती फैसला नहीं, बल्कि न्याय की तलाश में भटकते परिवारों की रूह कंपा देने वाली चीख है।

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