महाराष्ट्र में गोहत्या प्रतिबंध कानून बना किसानों के लिए संकट, गौरक्षा दल एक रैकेट लुटते है किसानों के जानवर!

महाराष्ट्र में गोहत्या प्रतिबंध क़ानून को लागू हुए 10 साल हो चुके हैं। 2015 में बनाए गए इस क़ानून का उद्देश्य मवेशियों की सुरक्षा और गोवंश संरक्षण बताया गया था, लेकिन एक दशक बाद तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। किसानों और पशु व्यापारियों का आरोप है कि यह क़ानून उनके लिए मददगार बनने के बजाय मुसीबत का कारण बन गया है।
किसान बोले – गोरक्षा के नाम पर चल रहा है रैकेट
अहमदनगर ज़िले के संगमनेर के युवा किसान दत्ता धागे कहते हैं –
“यह गोरक्षा नहीं, बल्कि एक रैकेट है। स्वघोषित गोरक्षक किसानों की गायें और बैल लूट रहे हैं। वे बीच रास्ते पर रोककर पैसे वसूलते हैं। इससे खेती और पशुपालन दोनों मुश्किल हो गए हैं।”
हाल ही में धागे समेत कई किसानों ने तहसीलदार कार्यालय के बाहर अपने मवेशियों के साथ प्रदर्शन किया और गोहत्या प्रतिबंध क़ानून में संशोधन की मांग उठाई। किसानों के साथ-साथ क़ुरैशी मीट व्यापारी भी इस आंदोलन में जुड़ गए हैं।
किसानों और व्यापारियों की शिकायतें
जालना ज़िले के गेवराई पशु बाज़ार में हर गुरुवार को बड़ी संख्या में किसान मवेशियों की खरीद-फरोख़्त के लिए जुटते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। व्यापारी सुरेश लहाने का कहना है –
“क़ानून की मंशा ठीक थी, लेकिन इसका ग़लत इस्तेमाल हो रहा है। कृषि के लिए जरूरी पशुओं के ट्रांसपोर्ट और व्यापार को रोकना गलत है।”
वहीं, पशु व्यापारी गणपत भोसले का आरोप है कि बजरंग दल जैसे संगठनों के कार्यकर्ता ट्रक रोककर उनसे वसूली करते हैं।
“कभी एक हज़ार, कभी दस हज़ार तक देना पड़ता है। एक बार तो हमारे साथी से 50 हज़ार रुपये वसूले गए।”
गोरक्षकों पर आरोप और इनकार
बजरंग दल, जो विश्व हिंदू परिषद की युवा शाखा है, इन आरोपों से इंकार करता है। वीएचपी प्रवक्ता श्रीराज नायर का कहना है –
“हम सिर्फ़ पुलिस की मदद से अवैध परिवहन रोकते हैं। हमारे ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं।”
लेकिन किसानों का कहना है कि पुलिस या प्रशासन कार्रवाई करे तो वे मान्य करेंगे, मगर बाहरी लोग उनकी रोज़ी-रोटी छीन रहे हैं।
क़ुरैशी समुदाय की हड़ताल
क़ुरैशी समाज, जो पारंपरिक रूप से मांस के व्यापार से जुड़ा है, पिछले दो महीनों से हड़ताल पर है। उनका आरोप है कि गोरक्षकों के डर से वे कारोबार नहीं कर पा रहे। ऑल इंडिया जमीयतुल क़ुरैशी के प्रदेश अध्यक्ष जावेद क़ुरैशी कहते हैं –
“अगर सरकार हमें रोके तो अलग बात है, लेकिन गोरक्षक हमें पीटते हैं, पशु ज़ब्त करते हैं और गोशालाओं में डाल देते हैं। यही वजह है कि हमने हड़ताल शुरू की है।”
सरकार की सफाई और किसानों का सवाल
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने हाल ही में आश्वासन दिया कि किसानों और व्यापारियों के साथ अन्याय नहीं होगा। इसके बाद पुलिस ने सर्कुलर जारी किया जिसमें कहा गया कि कार्रवाई सिर्फ़ पुलिस और अधिकारी करेंगे। हालांकि, इसमें गोरक्षकों के खिलाफ़ कोई आदेश शामिल नहीं था।
सांगोला में विरोध के दौरान विधायक सदाभाऊ खोत ने गोरक्षकों पर सवाल उठाते हुए कहा –
“गोरक्षा का गब्बर सिंह उन्हें किसने बनाया? क्या वे हमारे मवेशियों का चारा-पानी करते हैं? यह पूरी तरह से रैकेट है और इसका पर्दाफ़ाश होना चाहिए।”
आंकड़े और विशेषज्ञों की चेतावनी
सरकार का दावा था कि यह क़ानून गोवंश की संख्या बढ़ाएगा, लेकिन 2012 से 2019 के बीच महाराष्ट्र में गाय और बैलों की संख्या 10% घट गई। देसी गायों की संख्या तो 20% तक कम हो गई।
निंबकर एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की प्रमुख डॉ. चंदा निंबकर कहती हैं –
“चूंकि वध पर रोक है, इसलिए किसान नर बछड़ों को पाल नहीं सकते। कोई बाज़ार नहीं है, तो उन्हें सड़कों पर छोड़ दिया जाता है।”
फ़ूड कल्चर विशेषज्ञ शाहू पाटोले बताते हैं –
“पहले गाय-बैल किसानों के लिए एटीएम जैसे थे। उन्हें बेचकर तुरंत कैश मिल जाता था। अब वह रास्ता बंद हो गया है।”
कृषि अर्थशास्त्री श्रीकांत कुवलेकर कहते हैं –
“बैल खेती में साल में सिर्फ़ कुछ महीने काम आते हैं। बाकी समय किसान पर बोझ बन जाते हैं। जब फ़सल की कीमत ही लागत से कम हो, तो यह बोझ उठाना असंभव है।”
पशु व्यापार पर असर
गणपत भोसले के मुताबिक़ –
“अनप्रोडक्टिव मवेशियों की एक जोड़ी को पालने में सालाना 40 हज़ार रुपये खर्च आते हैं। यह खर्च कोई किसान नहीं उठा सकता।”
कभी गेवराई बाज़ार में हफ़्तेभर में 1 करोड़ से डेढ़ करोड़ रुपये का लेन-देन होता था। अब यह घटकर 10–15 लाख तक सीमित रह गया है। व्यापार 80% से भी ज्यादा घट चुका है और कीमतें 30–40% तक गिर गई हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर प्रतिबंधों में ढील नहीं दी गई तो अगले 10 साल में देशी गाय और बैल विलुप्त हो सकते हैं।
किसानों की मांग
किसान नेता राजू शेट्टी कहते हैं –
“अगर सिर्फ़ देशी गायों पर प्रतिबंध होता तो संकट इतना बड़ा नहीं होता। अब बैल भी नहीं बिकते।”
राज्य में 75 लाख परिवार सीधे तौर पर पशुपालन से जुड़े हैं। सरकार ने देशी गाय को ‘राजमाता-गोमाता’ घोषित किया और गोशालाओं के लिए सब्सिडी की बात कही है। लेकिन किसानों का कहना है कि बिना मुआवज़े के अनप्रोडक्टिव मवेशियों को पालना असंभव है।
किसान दत्ता धागे सवाल उठाते हैं –
“हम टैक्स देते हैं, तो बोझ सिर्फ़ किसान क्यों उठाए? अगर सरकार चाहती है कि हम अनप्रोडक्टिव मवेशियों को पालें, तो हमें सहयोग भी देना होगा।”
निष्कर्ष
महाराष्ट्र में गोहत्या प्रतिबंध क़ानून किसानों के लिए राहत के बजाय भारी संकट बन गया है। पशु बाज़ार ठप हैं, व्यापार प्रभावित है और लाखों परिवार रोज़ी-रोटी के संकट में हैं। किसान मानते हैं कि अनप्रोडक्टिव मवेशियों का वध उनकी इच्छा नहीं है, लेकिन अगर सरकार समाधान नहीं लाती, तो आने वाले समय में देशी गाय और बैल सिर्फ़ किताबों या चिड़ियाघरों तक सीमित हो जाएंगे।
