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मुंबई लोकल ट्रेन और मालेगांव ब्लास्ट में किसने गढ़े झूठे सबूत? ओवैसी की पार्टी AIMIM के नेता इम्तियाज जलील ने कोर्ट से की बड़ी मांग

महाराष्ट्र के चर्चित मालेगांव बम ब्लास्ट मामले में 17 साल बाद एनआईए कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है। विशेष एनआईए न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी को खारिज करते हुए स्पष्ट टिप्पणी की कि “आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता।”

इस फैसले में मुख्य आरोपी के रूप में नामजद की गईं बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, सेना के अधिकारी कर्नल श्रीकांत पुरोहित और अन्य सभी आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में निर्दोष करार दिया गया है।

इम्तियाज जलील की तीखी प्रतिक्रिया

मालेगांव विस्फोट मामले में फैसले के बाद औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) के पूर्व सांसद व एआईएमआईएम नेता इम्तियाज जलील ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि,
“झूठे सबूत आखिर किसने तैयार किए? उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?”
जलील ने कोर्ट से अपेक्षा जताई कि झूठी कहानी गढ़ने वाले पुलिस और जांच अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए, ताकि आगे निर्दोष लोगों को सालों तक न्याय के लिए भटकना न पड़े।

विधायक इस्माइल खालिक बोले – फैसले को देंगे चुनौती

मालेगांव से एआईएमआईएम विधायक मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक ने टाइम्स नाउ से बातचीत में कहा कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।
उन्होंने कहा,
“अगर रुबीना सिद्दीकी दोषी हो सकती है, तो साध्वी प्रज्ञा बरी कैसे?”
उन्होंने फैसले पर नाराजगी जताते हुए इसे एकतरफा करार दिया।

साध्वी प्रज्ञा की भावुक प्रतिक्रिया

कोर्ट से बरी होने के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कहा कि,
“मैं एक संन्यासी जीवन जी रही थी, लेकिन मुझे आतंकवादी कहा गया। मुझे 13 दिन अवैध हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया गया। इन झूठे आरोपों ने मेरी पूरी ज़िंदगी को बर्बाद कर दिया।”
उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को षड्यंत्र बताया और कहा कि वे शुरुआत से ही निर्दोष थीं।


पृष्ठभूमि
29 सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए विस्फोट में 6 लोगों की मौत हुई थी और 100 से अधिक घायल हुए थे। इस मामले की जांच पहले महाराष्ट्र एटीएस और बाद में एनआईए को सौंपी गई थी। यह केस भगवा आतंकवाद शब्द के केंद्र में रहा और राजनीतिक बहसों का प्रमुख विषय बना रहा।

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