पुणे में इंसानियत की मिसाल: बारिश में बर्बाद होती शादी को मुस्लिम परिवार ने दिया सहारा, हॉल सौंपकर रचाई नई मिसाल

पुणे: शहर के वानवड़ी इलाके में एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया कि जब दिलों में इंसानियत हो, तो मज़हब की दीवारें खुद-ब-खुद गिर जाती हैं। यहां एक शादी बारिश के कारण रुकने की कगार पर थी, लेकिन पास ही चल रही मुस्लिम रिसेप्शन पार्टी ने न सिर्फ अपनी जगह दी, बल्कि मदद और मोहब्बत की मिसाल पेश की।
घटना स्टेट रिज़र्व पुलिस फोर्स परिसर के पास स्थित “अलंकरण गार्डन” की है, जहां खुले लॉन में संस्कृती कवाडे और नरेंद्र गलांडे पाटिल की शादी धूमधाम से हो रही थी। शुभ मुहूर्त शाम 6:56 बजे का था, मेहमानों की चहल-पहल और ढोल-ताशों के बीच माहौल पूरी तरह विवाहमय हो गया था।
लेकिन तभी अचानक मूसलधार बारिश शुरू हो गई। लॉन पानी से भर गया, स्टेज और मंडप की सजावट तबाह हो गई। मेहमान भागने लगे और शादी रुकने के कगार पर आ गई। ऐसे में संस्कृती के पिता चेतन कवाडे और परिजन पास के अलंकरण हॉल पहुंचे, जहां मुस्लिम दंपती मोहसिन और माहीन का रिसेप्शन चल रहा था।
संकोच के साथ उन्होंने हॉल मांगने की गुज़ारिश की, तो मोहसिन के पिता और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी फ़ारूक़ काज़ी ने बिना किसी देर के हॉल पूरी तरह से हिंदू परिवार को सौंप दिया। रिसेप्शन रोक दिया गया और काज़ी परिवार खुद शादी की व्यवस्था में लग गया।
जल्द ही उसी हॉल में हिंदू रीति-रिवाजों के साथ संस्कृती और नरेंद्र की शादी संपन्न हुई। शादी के बाद दोनों परिवारों ने एक साथ तस्वीरें खिंचवाईं और एकजुटता की मिसाल कायम की।
फ़ारूक़ काज़ी ने कहा, “संस्कृती भी हमारी बेटी जैसी है। ऐसे वक्त में मज़हब नहीं, मदद की ज़रूरत होती है। इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।”
संस्कृती की मां ने भावुक होकर कहा, “बारिश ने मेरे अरमान भी भीगा दिए थे, लेकिन जब मोहसिन के पिता ने हमें जगह दी, तो लगा खुदा ने कोई फरिश्ता भेजा हो।”
बारिश थमने के बाद दोनों समुदायों के मेहमानों ने साथ बैठकर खाना खाया – एक ओर हलाल भोजन, तो दूसरी ओर शाकाहारी व्यंजन। न किसी ने टोका, न कोई भेदभाव हुआ। बस मोहब्बत और सम्मान की भाषा बोली गई।
संस्कृती के चाचा संजय कवाडे ने कहा, “आज हमने जाना कि इंसानियत धर्म से बड़ी होती है।”
यह सिर्फ एक शादी नहीं थी, बल्कि दो संस्कृतियों के संगम और साझी विरासत का प्रतीक बन गई – एक ऐसा पल जो दिखाता है कि भारत की आत्मा आज भी गंगा-जमुनी तहज़ीब से सराबोर है।
