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2006 मुंबई ब्लास्ट केस: 12 निर्दोष बरी, अबू आजमी बोले – असली गुनहगारों को बचाने के लिए मुसलमानों को फंसाया गया

मुंबई, 22 जुलाई 2025:
2006 के मुंबई लोकल ट्रेन सिलसिलेवार बम धमाकों के केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 12 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। करीब 19 साल जेल में बिताने के बाद मिली इस रिहाई से जहां इन निर्दोषों के परिवारों में राहत की सांस ली गई है, वहीं इस फैसले ने देश की जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

“19 साल बाद मिला इंसाफ, लेकिन बहुत देर से”: अबू आजमी
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक अबू आसिम आजमी ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे न्यायपालिका की देर से आई लेकिन सही कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा, “मैं पहले दिन से कहता आ रहा हूं कि इन लोगों को झूठे केस में फंसाया गया था। अदालत ने अब साबित कर दिया है कि मुसलमानों को सिर्फ शक के आधार पर जेल में डाला गया।”

धर्म के नाम पर टारगेटिंग का आरोप
आजमी ने जांच एजेंसियों पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि असली दोषियों को पकड़ने के बजाय मुसलमानों को बलि का बकरा बनाया गया। उन्होंने कहा कि इन बेकसूरों को आतंकवादी बताकर जेलों में ठूंसा गया, उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी गई।

टेलीफोन रिकॉर्ड तक नहीं दिए गए
अबू आजमी ने बताया कि शुरुआती जांच में पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) देने से मना कर दिया था, यह कहते हुए कि इसमें बहुत खर्च आएगा। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जब रिकॉर्ड सामने आए, तब पता चला कि आरोपी घटनास्थल के आसपास भी नहीं थे।

सरकार से मांग – मुआवजा दे, नौकरी दे और एसआईटी बनाए
आजमी ने सरकार से मांग की कि इन बेकसूरों को मुआवजा, घर और नौकरी दी जाए और जांच एजेंसियों को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन अफसरों की लापरवाही या जानबूझकर फंसाने की वजह से ये अन्याय हुआ, उनके खिलाफ केस चलना चाहिए और अगर वे रिटायर हो चुके हैं तो उनकी पेंशन बंद होनी चाहिए।

“सवाल उठता है – ब्लास्ट किया किसने?”
उन्होंने कहा कि जब ये 12 लोग बेकसूर हैं, तो असली गुनहगार कौन थे? क्या इन्हें फंसाकर असली अपराधियों को बचाया गया? अब सरकार को नई एसआईटी बनाकर असली साजिशकर्ताओं को सामने लाना चाहिए।

“सच्चाई सामने आई तो कुछ नेताओं को बुरा क्यों लग रहा है?”
आजमी ने कुछ नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि जब इन पर फांसी का फैसला हुआ था, तब आप खुश थे। अब जब सच्चाई सामने आई, तो अफसोस जता रहे हो? यह दोहरा रवैया देश की एकता को नुकसान पहुंचा रहा है।

“जिस कौम ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी, उसी को गद्दार बना दिया गया”
अंत में अबू आजमी ने कहा, “भारत का संविधान अगर सही मायनों में लागू होता, तो ये अन्याय कभी नहीं होता। जिस कौम ने देश की आज़ादी के लिए खून बहाया, उसी के बच्चों को आतंकवादी बना दिया गया। ये सोच बदलनी होगी।”

यह मामला न केवल 12 निर्दोषों की रिहाई का है, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक सवाल है – क्या देश में इंसाफ सिर्फ शक की बुनियाद पर रोका जा सकता है?

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