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शरिया कोर्ट और काजी अदालत को नहीं मिली कानूनी मान्यता: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत अदालतों और काजियात (दारुल कजा) द्वारा दिए गए फतवों और फैसलों को लेकर बड़ा और स्पष्ट आदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि भारत के कानून के तहत ‘काजी की अदालत’, ‘शरिया कोर्ट’ या ‘दारुल कजा’ की कोई कानूनी मान्यता नहीं है और उनके द्वारा दिए गए निर्देश या फतवे किसी पर बाध्यकारी नहीं हैं।

यह फैसला जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने दिया। पीठ ने 2014 के विश्व लोचन मदन बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए दोहराया कि शरिया अदालतें कोई वैधानिक या संवैधानिक संस्था नहीं हैं।

क्या है मामला?

मामला मध्यप्रदेश के भोपाल से जुड़ा है, जहां एक महिला ने CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने इस आधार पर महिला की याचिका खारिज कर दी कि उसके खिलाफ पहले ‘काजी की अदालत’ में एक समझौता डीड तैयार हुई थी और वह स्वयं वैवाहिक विवाद की जिम्मेदार थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा ‘काजी कोर्ट’ की डीड को वैध मानना पूरी तरह गलत है, क्योंकि इस प्रकार की अदालतों को भारतीय कानून के अंतर्गत कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:

  • काजी, दारुल कजा या शरिया कोर्ट के आदेश कानून में बाध्यकारी नहीं होते
  • कोई भी व्यक्ति केवल इस आधार पर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता कि किसी फतवे या काजी के आदेश के अनुसार उसके खिलाफ कुछ कहा गया है।
  • फैमिली कोर्ट का तर्क, कि दूसरी शादी होने के कारण दहेज की आशंका नहीं थी, अनुमान और पूर्वग्रह पर आधारित था, जो कानून के खिलाफ है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि महिला को भरण-पोषण के रूप में प्रति माह ₹4,000 दिए जाएं, जो याचिका की तारीख से लागू होगा।

निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला साफ करता है कि भारत में सिर्फ संवैधानिक और वैधानिक अदालतों के फैसले ही बाध्यकारी होते हैं। धार्मिक या निजी पंचायती स्तर पर लिए गए निर्णय सिर्फ आपसी सहमति तक सीमित रहते हैं और उनका कानूनी आधार नहीं होता। यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

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