आगरा में करणी सेना की तलवार रैली, पुलिस मूकदर्शक बनी रही

आगरा – राणा सांगा की जयंती के अवसर पर 12 अप्रैल को करणी सेना द्वारा आयोजित रैली ने आगरा को मानो रणभूमि में तब्दील कर दिया। ‘एक डंडा-एक झंडा’ के नारे के साथ बुलाई गई इस रैली में लोग न सिर्फ डंडे, बल्कि खुलेआम तलवारें और अन्य हथियार लेकर पहुंच गए। यह कथित शक्ति प्रदर्शन समाजवादी पार्टी के दलित सांसद रामजी सुमन के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया गया था।
सांसद रामजी सुमन ने राणा सांगा को लेकर इतिहासकारों के हवाले से एक बयान दिया था, जिसमें कहा गया कि राणा सांगा ने बाबर को भारत बुलाया था। इस बयान को लेकर करणी सेना भड़क उठी और सांसद के खिलाफ विरोध की एक श्रृंखला शुरू हो गई। 26 मार्च को करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने रामजी सुमन के घर पर हमला किया, पथराव किया और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था।
पुलिस के सामने उग्र प्रदर्शन
12 अप्रैल की रैली में करणी सेना के कार्यकर्ता खुलेआम तलवारें लहराते दिखे। पुलिस और पीएसी की तैनाती के बावजूद भीड़ को काबू में नहीं किया जा सका। एडिशनल कमिश्नर सहित कई आला अधिकारी मौके पर पहुंचे, मगर प्रदर्शनकारियों ने उनके सामने डंडे लहराए और नारेबाजी की, जिससे पुलिस को पीछे हटना पड़ा।
अखिलेश यादव को धमकी
रैली में एक करणी सेना नेता ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को जान से मारने की धमकी भी दे डाली। यह बयान कैमरे में कैद हुआ और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।
प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रशासन की निष्क्रियता पर कई सवाल उठ रहे हैं। हिंसक भीड़ के सामने पुलिस का बेबस होना और पहले से सुरक्षा इंतज़ाम के बावजूद उपद्रव रोक पाने में असफल रहना चिंता का विषय बना हुआ है।
समाजवादी पार्टी ने करणी सेना की इन हरकतों को दलित समुदाय पर सुनियोजित हमला बताया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने करणी सेना को भाजपा समर्थित संगठन बताते हुए सवाल उठाया कि क्या प्रशासनिक चुप्पी जानबूझकर है?
पुलिस की तैयारियों पर भी उठे सवाल
पुलिस ने दावा किया था कि रैली से पहले 1200 हेलमेट और 1000 डंडे मंगवाए गए थे। ड्रोन से निगरानी और बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई थी। बावजूद इसके, करणी सेना की उग्र भीड़ को नियंत्रित नहीं किया जा सका।
सोशल मीडिया पर बहस
सोशल मीडिया पर इस घटनाक्रम के कई वीडियो वायरल हैं, जिनमें हथियारों से लैस भीड़ दिख रही है। कई यूज़र्स ने पूछा है कि अगर किसान या दलित समुदाय ऐसा प्रदर्शन करता, तो क्या प्रशासन इतना नरम रहता?
क्या प्रशासनिक नरमी करणी सेना को बढ़ावा दे रही है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है – 26 मार्च की घटना के बाद क्या करणी सेना पर कोई ठोस कार्रवाई की गई? क्या सरकार और प्रशासन की मौन स्वीकृति से ही ऐसे संगठनों का हौसला बढ़ रहा है?
यह मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और दलित समुदाय की सुरक्षा का भी बनता जा रहा है।
