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जातिगत जनगणना में मुस्लिम जातियां भी होंगी शामिल: पसमांदा बनाम अशराफ का नया सियासी अध्याय खुलने की तैयारी

भारत में जातिगत जनगणना को लेकर एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब सिर्फ हिंदू जातियों की नहीं, बल्कि मुस्लिम जातियों की भी गणना की जाएगी। धर्म के साथ-साथ जाति का कॉलम जोड़ने की तैयारी सरकार की ओर से की जा रही है, जिससे देश की सामाजिक हकीकतों को नए सिरे से परखा जा सकेगा। इससे ना सिर्फ सामाजिक-आर्थिक तस्वीर साफ होगी, बल्कि आरक्षण की राजनीति और सियासी समीकरणों में भी बड़ा उलटफेर हो सकता है।

तीन वर्गों में बंटा मुस्लिम समाज

मुस्लिम समुदाय को आमतौर पर एक समान माना जाता रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि मुस्लिम समाज भी हिंदुओं की तरह जातियों में विभाजित है।

  1. अशराफ (उच्च जातियां) – सैय्यद, शेख, पठान, मुगल, रांगड़ आदि
  2. पसमांदा (पिछड़ी जातियां) – अंसारी, कुरैशी, तेली, गद्दी, सलमानी, दर्जी आदि
  3. अजलाल (अतिपिछड़ी जातियां) – धोबी, भंगी, नट, मेहतर, मोची, मछुआरा आदि

मंडल युग के बाद अब मुसलमानों में भी नया सामाजिक वर्गीकरण

मंडल आयोग के लागू होने के बाद हिंदुओं की तरह मुस्लिमों में भी ‘अशराफ’ और ‘पसमांदा’ का विभाजन उभरा था। हालांकि अब तक मुस्लिम समाज के पास ओबीसी के तहत कोई प्रमाणिक जातिगत डाटा नहीं था। बिहार और तेलंगाना में हुए जाति सर्वे ने इस दिशा में रास्ता दिखाया, जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों की जातियों के आंकड़े जुटाए गए। अब जब यह कवायद राष्ट्रीय स्तर पर होने जा रही है, तो मुस्लिम समाज के अंदर की वास्तविक सामाजिक असमानता सामने आने की संभावना है।

पसमांदा बनाम अशराफ: सामाजिक और सियासी वर्चस्व की लड़ाई

माना जाता है कि भारत में 80–85% मुसलमान पसमांदा (पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों) हैं, जबकि सिर्फ 15% अशराफ जातियां हैं, लेकिन ज्यादातर राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक पदों पर अशराफों का ही दबदबा रहा है।
जातिगत जनगणना के बाद पसमांदा मुस्लिमों को यह कहने का आधार मिल सकता है कि मुस्लिम आरक्षण का लाभ कुछ ऊंची जातियों तक सीमित रहा है, जबकि पिछड़े मुस्लिम वंचित रह गए।

आरक्षण की 50% लिमिट पर असर तय

जनगणना से मिले आंकड़ों के आधार पर OBC जातियां अपनी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग कर सकती हैं। यदि ओबीसी का आंकड़ा अधिक निकलता है तो आरक्षण की 50% की संवैधानिक सीमा को तोड़ने की मांग तेज होगी। इससे जहां ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ जैसे हिंदू सवर्णों की बेचैनी बढ़ेगी, वहीं मुस्लिम समाज में शेख, सैय्यद, पठान जैसे सवर्ण तबके भी विरोध में आ सकते हैं।

राजनीतिक प्रभाव: पसमांदा मुसलमानों को साधने की कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पिछले कुछ समय से पसमांदा मुसलमानों को साधने की कोशिश में हैं। ऐसे में जातिगत जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद भाजपा हो या विपक्ष, हर पार्टी को अपने मुस्लिम कार्ड को पुनर्परिभाषित करना पड़ सकता है।

निष्कर्ष:
जातिगत जनगणना से अब यह स्पष्ट होगा कि मुसलमानों का समाज भी समान नहीं है – वहां भी वर्चस्व, वंचना और प्रतिनिधित्व का संकट है। जैसे मंडल आयोग ने हिंदू समाज में बदलाव की लहर चलाई थी, वैसे ही यह जनगणना मुस्लिम समाज के भीतर नए सामाजिक और सियासी विमर्श की शुरुआत कर सकती है।

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