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रामराज का वादा, लेकिन औरंगाबाद में रावणराज! प्रशासक श्रीकांत के बुलडोजर से तबाह हुए हजारों घर और दुकानें

रिपोर्ट: नज़ीमोद्दीन काज़ी

औरंगाबाद शहर में रस्ता रुंदीकरण के नाम पर नगर निगम प्रशासक श्रीकांत द्वारा की गई कार्रवाई से पूरे शहर में हाहाकार मच गया है। हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों को नज़रअंदाज़ करते हुए बिना किसी कानूनी प्रक्रिया और मुआवज़ा दिए हजारों घरों और दुकानों पर बुलडोजर चला दिया गया। इस कार्रवाई ने सिर्फ इमारतें नहीं गिराईं, बल्कि हजारों लोगों की ज़िंदगी, रोज़गार और सपनों को भी मलबे में दफना दिया।

हाई कोर्ट ने पहले ही साफ निर्देश दिया था कि रस्ता रुंदीकरण से पहले भू-संपादन, अवॉर्ड प्रक्रिया और मुआवज़ा देना अनिवार्य है। इसके बावजूद प्रशासक श्रीकांत ने अदालत के आदेशों की खुलेआम अवहेलना करते हुए सीधे तोड़फोड़ का रास्ता अपनाया। इस वजह से शहर में हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है।

प्रभावित नागरिकों का कहना है कि प्रशासक ने विरोध करने वालों को धमकी दी – “बीच में आए तो गुन्हा दर्ज होगा।” लोकतंत्र में इस तरह का व्यवहार क्या एक अधिकारी को शोभा देता है? क्या जनता को अपनी बात कहने का भी अधिकार नहीं?

इस मुद्दे को भाजपा विधायक प्रशांत बंब ने विधानसभा में जोरदार तरीके से उठाया और प्रशासक की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई न सिर्फ अवैध है, बल्कि क्रूर भी है।

शहरवासी यह भी सवाल कर रहे हैं कि 30–40 वर्षों से रुका हुआ रुंदीकरण अचानक आज क्यों किया गया? क्या इसके पीछे किसी बिल्डर लॉबी या निजी हितों का दबाव है?

जनता की तीन मुख्य माँगें हैं:

  1. प्रशासक श्रीकांत को तुरंत पद से हटाया जाए।
  2. जिन लोगों की संपत्तियां उजाड़ी गई हैं, उन्हें मुआवज़ा दिया जाए।
  3. हाई कोर्ट के आदेश की अवमानना करने पर कानूनी कार्रवाई की जाए।

यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि संविधान, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों का खुला अपमान है। अब यह देखना होगा कि क्या राज्य सरकार इस अधिकारी के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी या चुपचाप तमाशा देखती रहेगी।

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