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आसिफ जरदारी जाएंगे, मुनीर आएंगे? पाकिस्तान की राजनीति में बड़ा उलटफेर तय

1977 की पुनरावृत्ति? सेना के इशारे पर बदलेगा पाकिस्तान का लोकतांत्रिक चेहरा

पाकिस्तान में एक बार फिर लोकतंत्र पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। लंबे समय से जिस तख्तापलट की आशंका जताई जा रही थी, वह अब सच्चाई बनती नजर आ रही है। खबर है कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को पद से हटाकर देश की बागडोर सीधे सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को सौंपने की तैयारी पूरी हो चुकी है।

पाकिस्तान में मौजूदा संसदीय व्यवस्था को समाप्त कर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की योजना पर काम तेज़ हो गया है। सूत्रों के मुताबिक यह पूरा घटनाक्रम सेना के इशारे पर आगे बढ़ रहा है और लोकतंत्र के नाम पर एक ‘नरम तख्तापलट’ की पटकथा तैयार हो चुकी है।

हाल ही में आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई है, जिसके बाद उन्हें आजीवन विशेषाधिकार और कानूनी सुरक्षा मिल गई है। अब वह न केवल सेना के, बल्कि पूरे देश की सत्ता के सर्वेसर्वा बनने की दिशा में अग्रसर हैं। अमेरिका, चीन और सऊदी अरब की उनकी हालिया राजनयिक यात्राएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि पाकिस्तान की विदेश नीति भी अब उन्हीं के हाथों में है।

जरदारी की कुर्सी मुनीर को, बिलावल को मिल सकता है नया दायित्व

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बिलावल भुट्टो को नई जिम्मेदारी दिए जाने की भी योजना है। बताया जा रहा है कि शरीफ़ परिवार को दरकिनार करते हुए पीपीपी और सेना का गठजोड़, बिलावल को आगे लाने की पटकथा लिख रहा है। वहीं जरदारी, राष्ट्रपति की कुर्सी त्याग कर मुनीर को सत्ता सौंपने के लिए तैयार बताए जा रहे हैं।

इस घटनाक्रम से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ और शरीफ़ परिवार में भारी हलचल है। नवाज़ शरीफ़ और प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ को डर है कि राष्ट्रपति प्रणाली लागू होने पर न केवल उनकी सरकार गिरेगी, बल्कि उनका राजनीतिक अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। यही कारण है कि वे सेना के अन्य धड़ों से संपर्क में हैं।

तानाशाही की वापसी का संकेत

यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब 1977 में जनरल ज़िया-उल-हक़ के तख्तापलट की बरसी समीप है। ऐसे में इसे एक बार फिर तानाशाही की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान के इतिहास में अयूब खान, ज़िया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ जैसे सेना प्रमुखों ने लोकतंत्र को कुचल कर राष्ट्रपति की कुर्सी हथियाई थी — अब आसिम मुनीर उसी राह पर चलते दिख रहे हैं।

जनता का रुख अहम

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान की जनता इस बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया देगी? इमरान खान पहले ही जेल में हैं और विपक्ष कमजोर है। ऐसे में अगर यह योजना अमल में लाई जाती है तो पाकिस्तान में लोकतंत्र एक बार फिर केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

जनता, जो पहले ही महंगाई, भ्रष्टाचार और अस्थिरता से जूझ रही है, क्या अब सेना के इस कदम को चुपचाप स्वीकार करेगी? या फिर कोई बड़ा जनआंदोलन सामने आएगा — यह आने वाला समय ही बताएगा।

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