फार्मा फेयर का खुलासा: 10 की दवा 1000 में, डॉक्टर-डीलर की मिलीभगत से लुट रहा आम आदमी
बीमार होने के बाद जब आम आदमी इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचता है, तो उसकी जेब पर बड़ा बोझ पड़ता है। हरिभूमि की तहकीकात में राजधानी के एक निजी होटल में आयोजित इंडियन फार्मा फे में दवा उद्योग में चल रहे भारी मुनाफाखोरी और डॉक्टरों की कमीशनखोरी का चौंकाने वाला सच सामने आया है।
हमने रिपोर्टर बनकर सात फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधियों से बात की। पांच कंपनियां इस बात के लिए तैयार दिखीं कि यदि डॉक्टर का कमीशन तय हो जाए, तो वे सामान्य दवाओं की एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) को आठ गुना तक बढ़ाकर छाप सकती हैं। यानी 10 रुपये की दवा की कीमत 80 रुपये और 130 रुपये की दवा को 1000 रुपये तक दिखाने के लिए कंपनियां राज़ी थीं।
कुछ अहम खुलासे:
- डॉक्टर कमीशन के लिए एमआरपी तय करने की छूट।
- दवाओं की लागत, डॉक्टर कमीशन और मुनाफा जोड़कर खुद एमआरपी तय करें, कंपनी छाप देगी।
- एक ही बैच की दवा अलग-अलग रेट पर सप्लाई करने को भी कंपनियां तैयार।
- एक प्रतिनिधि ने साफ कहा – “आप ही बता दो, कितना प्रिंट करना है।”
ईमानदार भी मिला:
एक फार्मा प्रतिनिधि ने इस लालच से इंकार करते हुए कहा कि वह नियमों के खिलाफ जाकर एमआरपी नहीं बदल सकता।
जेनेरिक दवाओं में भी खेल:
जेनेरिक दवाएं जो सस्ती और बिना ब्रांड के होती हैं, उनके नाम पर भी कंपनियां लोगों को ठग रही हैं। कम कीमत वाली दवाओं को ज्यादा एमआरपी पर बेचने के लिए छूट का दिखावा किया जाता है।
मरीजों की मजबूरी:
कई दवाएं केवल डॉक्टर द्वारा बताई गई दुकान पर ही मिलती हैं। ऐसे में मरीज मजबूरी में महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर होता है।
निष्कर्ष:
दवाओं की कीमतों के इस खेल में डॉक्टर, दवा कंपनियां और केमिस्ट मिलकर मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि भुगतना आम आदमी को पड़ रहा है। यह खेल न सिर्फ आर्थिक शोषण है, बल्कि स्वास्थ्य के साथ भी बड़ा खिलवाड़ है।
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