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दवा की दुकान पर लूट की स्कीम: 10 की दवा पर 1000 की MRP, डॉक्टर-डीलर की मिलीभगत से मरीजों की जेब पर डाका

रायपुर बीमारियों से जूझते आम लोगों को इलाज के नाम पर कैसे लूटा जा रहा है, इसकी पोल एक फार्मा फेयर में खुल गई। जहां फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधियों ने खुलकर स्वीकार किया कि डॉक्टरों के कमीशन और दुकानदारों के मुनाफे के लिए दवाओं की कीमतों में आठ से दस गुना तक की हेराफेरी की जाती है। कुछ दवाएं 10 रुपये में बनती हैं, लेकिन उनके पैकेट पर 1000 रुपये तक की एमआरपी छापने को कंपनियां तैयार हैं।

कैसे हुआ खुलासा?

राजधानी के एक निजी होटल में आयोजित फार्मा फेयर में रिपोर्टर ने खुद को मेडिकल स्टोर संचालक बताकर फार्मा कंपनियों से संपर्क किया। बातचीत में यह सामने आया कि यदि ऑर्डर की मात्रा ठीक हो और डॉक्टर का कमीशन तय हो, तो कंपनियां किसी भी दवा पर मनचाही कीमत छाप सकती हैं।

कुछ प्रमुख खुलासे:

  • 130 रुपये की दवा पर 1000 रुपये की एमआरपी छापने का प्रस्ताव
  • डॉक्टरों के कमीशन के अनुसार एमआरपी तय करने को तैयार कंपनियां
  • सरकारी रेट वाली दवाएं छोड़कर सभी पर मनमाना दाम लिखने की छूट
  • सिर्फ एक कंपनी ने कहा कि वह एमआरपी से छेड़छाड़ नहीं कर सकती

दवा के नाम पर खुलेआम खेल

फार्मा कंपनियों ने बताया कि यदि ग्राहक ऑर्डर में 100 से 300 पैकेट दवा ले, तो उस विशेष बैच पर मनचाही एमआरपी प्रिंट की जा सकती है। कंपनियों ने यह भी स्वीकार किया कि अलग-अलग इलाकों में एक ही दवा को अलग-अलग रेट पर सप्लाई करना आम बात है।

जेनेरिक दवाओं में भी गड़बड़ी

सस्ती और बिना ब्रांड वाली जेनेरिक दवाओं में भी यह खेल चलता है। कंपनियां इन पर भी जरूरत से ज्यादा एमआरपी छापती हैं और फिर भारी छूट का झांसा देकर महंगे दामों में उन्हें बेच देती हैं।

मरीज की मजबूरी, डॉक्टर की दुकान

कुछ दवाएं केवल डॉक्टर द्वारा बताए गए मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं। ये खासकर उसी डॉक्टर और दवा दुकानदार के लिए तैयार की जाती हैं, जिससे मरीज को मजबूरी में मनचाहे दाम चुकाकर दवा लेनी पड़ती है।

सरकारी नियम भी नहीं बना पा रहे ढाल

कंपनियों ने माना कि जिन दवाओं की कीमतें सरकार तय करती है, उन पर एमआरपी में हेराफेरी नहीं की जा सकती, लेकिन बाकी सभी दवाएं इस खेल का हिस्सा हैं।


निष्कर्ष:

इलाज के नाम पर मुनाफा कमाने की होड़ में डॉक्टर, दवा कंपनियां और मेडिकल स्टोर मरीजों की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। यह न सिर्फ चिकित्सा नैतिकता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह संकेत देता है कि बिना सख्त निगरानी और कार्रवाई के स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी के लिए महज एक कारोबार बनकर रह जाएंगी।

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