शासन निर्णय पर भुजबळ का हमला – “लोकशाही में जरांगेशाही बर्दाश्त नहीं”

नाशिक: मराठा आरक्षण आंदोलन की पृष्ठभूमि में जारी किए गए कुणबी प्रमाणपत्र संबंधी शासन निर्णय (जीआर) पर राज्य के वरिष्ठ मंत्री और ओबीसी नेता छगन भुजबळ ने बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि यह शासन निर्णय राज्य मंत्रिमंडल के सामने पेश ही नहीं किया गया और सरकार ने इसे जल्दबाजी में, सिर्फ एक समाज के दबाव में जारी किया है।
भुजबळ ने पत्रकार परिषद में आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यह स्पष्ट कर रहे हैं कि शासन निर्णय से ओबीसी समाज को कोई नुकसान नहीं होगा, परंतु जीआर में लिखी गई कुछ पंक्तियां भविष्य में ओबीसी समाज के साथ अन्याय का मार्ग खोलती हैं। इसी आधार पर उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का ऐलान किया।
“मराठा दबाव में लिया गया निर्णय”
भुजबळ ने कहा कि सरकार ने कुणबी प्रमाणपत्र देने की नई प्रक्रिया मंत्रिमंडल की मंजूरी और आपत्तियाँ व सुझाव मांगे बिना लागू कर दी। यह पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि निर्णय में “पात्र” शब्द शामिल था, तो मराठा आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटील ने दबाव डालकर वह शब्द हटवाया। भुजबळ ने सवाल किया – “लोकशाही में यह जरांगेशाही कैसी?”
“मराठा और कुणबी दो भिन्न जातियाँ”
भुजबळ ने स्पष्ट किया कि शासन ने पहले ही माना है कि मराठा और कुणबी अलग जातियाँ हैं। कुणबी जाति ओबीसी वर्ग में शामिल है, जबकि मराठा समाज को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से SEBC (Socially and Educationally Backward Class) मानकर 10% आरक्षण दिया गया है। ऐसे में मराठा समाज को ओबीसी के अंतर्गत शामिल करने की प्रक्रिया गैरकानूनी और भेदभावपूर्ण है।
“शपथपत्रों से जाति तय करना खतरनाक”
भुजबळ ने यह भी कहा कि शासन निर्णय में “नातेसंबंध” शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका दायरा स्पष्ट नहीं है। इसमें पितृकुल, मातृकुल और दत्तक संबंधों तक सभी को शामिल किया जा सकता है। इसके चलते दूर के रिश्तेदारों के शपथपत्रों के आधार पर जाति प्रमाणपत्र बनाए जा सकते हैं, जो समाज के लिए अत्यंत खतरनाक है।
भुजबळ ने दो टूक कहा कि यह निर्णय ओबीसी और अन्य जातियों के अधिकारों के साथ भेदभाव करने वाला है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सिर्फ मराठा समाज के दबाव में लिया गया है। इसी कारण वे शीघ्र ही न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती देंगे।
