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तीन साल की बच्ची ने किया संथारा: इंदौर की घटना से जैन परंपरा पर उठे सवाल, धार्मिक आस्था या हत्या?

इंदौर में तीन साल की मासूम बच्ची द्वारा संथारा लेने की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जैन समाज की इस प्राचीन परंपरा के नाम पर इतनी छोटी उम्र में एक बच्ची की मृत्यु को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या यह धार्मिक आस्था का सम्मान है या एक मासूम की ज़िंदगी छीन लेने का तरीका?

बच्ची वियाना को जनवरी 2025 में ब्रेन ट्यूमर हुआ था। इलाज के बाद वह थोड़ी बेहतर हुई, लेकिन मार्च में तबीयत फिर बिगड़ गई। परिवार ने उसे आध्यात्मिक संत राजेश मुनि महाराज के पास ले जाया, जिन्होंने संथारा का सुझाव दिया। परिजनों की सहमति से आधे घंटे की धार्मिक प्रक्रिया के दौरान वियाना ने प्राण त्याग दिए। इसे ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दुनिया की सबसे कम उम्र की संथारा लेने वाली के रूप में दर्ज किया गया है।

क्या है संथारा?

संथारा जैन धर्म की एक परंपरा है, जिसमें कोई व्यक्ति मृत्यु के निकट होने पर स्वेच्छा से भोजन और जल का त्याग करता है ताकि वह शांति और वैराग्य के साथ शरीर त्याग सके। इसे आत्महत्या नहीं, बल्कि मोक्ष की साधना माना जाता है। लेकिन यह परंपरा वयस्कों के लिए मानी जाती है, जिन्हें आत्मिक और मानसिक रूप से इसके लिए तैयार होने की क्षमता हो।

परंतु, क्या यह धार्मिक आस्था के नाम पर हत्या नहीं?

यह सवाल अब पूरे समाज में गूंज रहा है — जब जीवन और मृत्यु का नियंत्रण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के हाथ में है, तो हम कौन होते हैं किसी मासूम को मृत्यु के लिए प्रेरित करने वाले? क्या यह धार्मिक आस्था के नाम पर एक सुनियोजित हत्या नहीं है? क्या यह बच्ची इतनी परिपक्व थी कि वह स्वयं मृत्यु का निर्णय ले सके?

बच्चों की मानसिक स्थिति, उनकी सोचने-समझने की क्षमता, और स्वतंत्र निर्णय लेने की उम्र को लेकर यह मामला बेहद गंभीर कानूनी और नैतिक बहस छेड़ता है। जैन धर्म के विद्वान भी मानते हैं कि संथारा का निर्णय मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार व्यक्ति ही ले सकता है — न कि कोई बच्चा, जिसकी चेतना अभी विकसित हो रही होती है।

ज़रूरत है विचार और विवेक की

यह घटना न केवल धार्मिक परंपरा की सीमाओं को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि आस्था के नाम पर हम कब मासूम जीवन के अधिकारों को कुचल देते हैं। क्या किसी धर्म को यह अधिकार होना चाहिए कि वह एक बच्चे के जीवन-मृत्यु का फैसला करे?

यह समय है जब समाज, कानून और धार्मिक संस्थाएं मिलकर यह तय करें कि श्रद्धा और शोषण की सीमा रेखा कहां खिंचनी चाहिए।

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