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सुप्रीम कोर्ट में याचिका: 43 रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को आंख और हाथ बांधकर समुद्र में फेंकने का आरोप

सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर सनसनीखेज आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार ने 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को जबरन देश से बाहर निकालते हुए, उनकी आंखों और हाथों को बांधकर समुद्र में फेंक दिया। याचिका में दावा किया गया है कि इन शरणार्थियों में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इन रोहिंग्या शरणार्थियों को तत्काल दिल्ली वापस लाया जाए और उन्हें कस्टडी से रिहा किया जाए। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इन लोगों को पहले बायोमीट्रिक डिटेल्स के लिए बुलाया गया था, लेकिन उन्हें रिहा करने के बजाय देश से बाहर निकाल दिया गया।

गंभीर आरोप: एयरपोर्ट से पोर्ट ब्लेयर, फिर समुद्र में फेंकने का दावा

याचिका के अनुसार, रोहिंग्या शरणार्थियों को पहले एयरपोर्ट ले जाया गया, फिर उन्हें पोर्ट ब्लेयर भेजा गया, जहां नेवी के जहाजों में बैठाकर उनकी आंखें और हाथ बांध दिए गए। इसके बाद, आरोप है कि उन्हें समुद्र में फेंक दिया गया, जिससे उनकी जान को गंभीर खतरा पैदा हो गया।

सरकार की दलील: सुप्रीम कोर्ट के 2021 के आदेश का पालन

सरकारी पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 8 अप्रैल 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि सरकार के पास अवैध रूप से देश में रह रहे लोगों को निर्वासित करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में कानून का पालन किया गया है।

यूएनएचआरसी कार्ड होने के बावजूद कार्रवाई का आरोप

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि जिन रोहिंग्या शरणार्थियों को बाहर निकाला गया, उनके पास संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHRC) द्वारा जारी पहचान पत्र भी मौजूद थे। इसके बावजूद उन्हें गिरफ्तार किया गया और देश से बाहर कर दिया गया।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार भारत में रह रहे सभी व्यक्तियों को दिए गए हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कोई भी व्यक्ति अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर यहां बना रह सकता है।

अब यह मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और कोर्ट इस पर क्या फैसला लेता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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