ओवैसी का केंद्र पर हमला: “साढ़े 7 लाख की फौज के बीच 4 चूहे कैसे घुस आए?” – भारत-पाक क्रिकेट मैच पर भी उठाए सवाल

नई दिल्ली: संसद के मॉनसून सत्र के दौरान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर बहस के बीच एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आतंकियों की घुसपैठ, सुरक्षा चूक, भारत-पाक क्रिकेट मैच और सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए।
“ऑपरेशन सिंदूर जवाब था, लेकिन सवाल जवाबदेही का है”
ओवैसी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया, लेकिन यह जवाब उन चार आतंकियों की घुसपैठ का नहीं है जो देश के भीतर आकर हमारे नागरिकों को मार गए। उन्होंने तीखे लहजे में पूछा, “साढ़े 7 लाख की फौज और तमाम सुरक्षा एजेंसियों के बावजूद ये चार चूहे देश में कैसे घुस आए? अगर एलजी जिम्मेदार हैं तो उन्हें हटाइए, अगर आईबी जिम्मेदार है तो कार्रवाई कीजिए। क्या सिर्फ ऑपरेशन कर देने से सब कुछ भूल जाएं?”
भारत-पाक क्रिकेट मैच पर आपत्ति
भारत-पाक क्रिकेट मैच को लेकर ओवैसी ने सवाल किया, “अगर आतंकवाद और बातचीत साथ नहीं चल सकती, तो फिर क्रिकेट कैसे खेला जा सकता है?” उन्होंने सरकार से पूछा, “क्या आप उन शहीदों के परिवारों को कॉल कर सकते हैं और कह सकते हैं कि हमने बदला ले लिया, अब पाकिस्तान से क्रिकेट देखिए?” उन्होंने कहा कि उनका जमीर इसकी इजाज़त नहीं देता।
देश में एकजुटता ज़रूरी, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना बंद करें
ओवैसी ने कहा कि पाकिस्तान की मंशा भारत को अस्थिर करना है, और अगर हम देश के अंदर एकजुट नहीं रहेंगे तो ये ताकतें अपने मकसद में कामयाब हो सकती हैं। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि अगर अल्पसंख्यकों को बुलडोजर और सांप्रदायिकता के जरिए डराया गया, तो यह देश की आंतरिक एकता को कमजोर करेगा। “जब देश के भीतर एकजुटता होगी, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी,” उन्होंने जोड़ा।
विदेश नीति और ‘व्हाइट हाउस’ पर तंज
ओवैसी ने कहा कि भारत की विदेश नीति तब कैसे सफल मानी जा सकती है, जब पाकिस्तान का आर्मी चीफ अमेरिका में बैठकर राष्ट्रपति से मिलता है और खाना खाता है, और वहीं से भारत के सीजफायर का ऐलान होता है। उन्होंने संविधान की प्रस्तावना का हवाला देते हुए कहा, “हम संप्रभु राष्ट्र हैं, अपने फैसले खुद लेंगे – कोई गोरा व्हाइट हाउस में बैठकर हमारा भविष्य तय नहीं करेगा।”
ओवैसी के इन बयानों से साफ है कि उन्होंने सरकार की कश्मीर नीति, सुरक्षा एजेंसियों की जवाबदेही, पाकिस्तान के प्रति रुख और विदेश नीति को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। संसद में उनकी ये आवाज़ राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे सकती है।
