अनुराधा भसीन का सवाल: “कुछ घंटों में हमलावरों की पहचान कैसे हुई?” — जांच की विश्वसनीयता पर उठाए गंभीर प्रश्न

पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्रकार और कश्मीर मामलों की विशेषज्ञ अनुराधा भसीन का कहना है कि उन्होंने 1990 के दशक से अब तक कभी ऐसी कोई सार्वजनिक जगह नहीं देखी जहाँ सुरक्षा व्यवस्था न हो। वह इस बात पर हैरानी जताती हैं कि इतने लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर हमले के समय सुरक्षा क्यों नदारद थी।
भसीन ने हमले के तुरंत बाद हमलावरों के नाम सार्वजनिक होने और पीड़ितों की तस्वीरें जारी होने पर भी सवाल उठाए हैं। वह कहती हैं कि इस तरह की घटनाओं में जांच की विश्वसनीयता पहले भी सवालों के घेरे में रही है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों को वहाँ पहुँचने में समय लगा, लेकिन कुछ घंटों में हमलावरों की पहचान कर लेना संदेह पैदा करता है।
उनका मानना है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भी कश्मीर में ऐसी घटनाएँ होती रही हैं और पिछले पाँच वर्षों में जो शांति दिखती है, वह वास्तविक कम और सैन्य नियंत्रण के कारण ज़्यादा है। भसीन के अनुसार सुरक्षा से जुड़े अधिकारी भी “मिलिटेंसी का खात्मा” नहीं, बल्कि “नियंत्रण” जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं।
जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू भसीन की बातों से कुछ हद तक सहमति जताते हैं। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में पर्यटन स्थलों पर भारी सैन्य उपस्थिति को कम करने की नीति अपनाई गई है ताकि आम माहौल बना रहे। हालांकि, उन्होंने इसे एक बड़ी सुरक्षा चूक माना है।
पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपी वैद ने कहा कि पर्यटकों को जब दूरदराज़ इलाक़ों में ले जाया जाता है, तो वहाँ पुलिस या अर्धसैनिक बलों की उपस्थिति होनी चाहिए। उन्होंने माना कि सीमित संसाधनों के बावजूद ऐसे इलाकों में न्यूनतम सुरक्षा व्यवस्था ज़रूरी थी।
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ, जो लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर में तैनात रहे हैं, उन्होंने बताया कि सेना और राष्ट्रीय राइफल्स मुख्यतः सीमा क्षेत्रों में आतंकवाद से निपटने के लिए होती हैं और हर पर्यटन स्थल पर उनकी मौजूदगी संभव नहीं। उन्होंने कहा कि इस बार आतंकियों ने आम नागरिकों को निशाना बनाकर रणनीति में बदलाव दिखाया है, जो पहले नहीं देखा गया था।
दुआ का मानना है कि नागरिकों को निशाना बनाना स्थानीय समर्थन को खत्म कर सकता है, क्योंकि पर्यटन कश्मीरियों की आजीविका से जुड़ा है। उन्होंने इस हमले को भारत के अन्य हिस्सों में भावनात्मक प्रतिक्रिया भड़काने की कोशिश बताया। उनका कहना है कि आतंकियों ने जानबूझकर हिंदू पुरुषों को निशाना बनाकर एक सुनियोजित सन्देश देने की कोशिश की।
उन्होंने इस हमले की तुलना 2023 में इसराइल में हुए हमास के नोवा म्यूज़िक फ़ेस्टिवल हमले से की और कहा कि इस तरह के हमले आम नागरिकों में अधिक भय और प्रतिक्रिया पैदा करते हैं।
प्रोफ़ेसर मट्टू का यह भी कहना है कि पाकिस्तान की भूमिका पर उन्हें कोई संदेह नहीं है। उन्होंने इसे एक गंभीर ख़ुफ़िया नाकामी बताया और सवाल उठाया कि अगर ऐसा हमला होने वाला था, तो कोई इलेक्ट्रॉनिक या अन्य सूचना क्यों नहीं मिली।
लेफ्टिनेंट जनरल दुआ ने भी माना कि इस मामले में खुफिया तंत्र की विफलता रही। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने मुसलमानों की श्रेष्ठता पर बात की थी, एक संकेत था जिसे गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्होंने कहा कि आतंकवादी हमलों की मंज़ूरी अक्सर शीर्ष स्तर पर होती है और हमें ज़मीनी स्तर की ख़ुफ़िया जानकारी पर और काम करना होगा।
हमले के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी’ की बैठक हुई। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बताया कि हमले के तार सीमा पार से जुड़े हैं। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई क़दम उठाए, जिनमें सिंधु जल समझौते का निलंबन, वीज़ा रद्द करना और अटारी सीमा को बंद करना शामिल है। पाकिस्तान के कई राजनयिकों को देश छोड़ने का आदेश भी दिया गया।
यह हमला जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा, खुफिया तंत्र और रणनीति की गंभीर समीक्षा की मांग करता है।
