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शिंदे सरकार के दौरान विवादों में घिरे रहे शिवसेना के पूर्व मंत्री और सिल्लोड विधायक अब्दुल सत्तार फिर एक बार कानून के शिकंजे में

सिल्लोड/प्रतिनिधि 

शिवसेना के पूर्व मंत्री और सिल्लोड के विधायक अब्दुल सत्तार एक बार फिर कानून के घेरे में आ गए हैं। 2014 के एक पुराने मामले में सिल्लोड न्यायालय ने पुलिस को जांच कर एक माह के भीतर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव से ठीक पहले यह मामला सामने आने से सत्तार की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ने की संभावना है।

क्या है 32 लाख रुपये की एंबुलेंस घोटाले की कहानी?
साल 2014 में अब्दुल सत्तार मंत्री रहते हुए अपने विधायक निधि से 16-16 लाख रुपये की दो एंबुलेंस (कुल 32 लाख रुपये) खरीदी थीं। सरकारी नियमों के अनुसार, सरकारी धन से खरीदी गई एंबुलेंस किसी निजी संस्था या अस्पताल को नहीं दी जा सकती। मगर सत्तार ने यह नियम तोड़ते हुए बिना सरकारी अनुमति के दोनों एंबुलेंस अपनी ही ‘प्रगती शिक्षण संस्था’ को सौंप दीं।

आरोप है कि यह संस्था उनकी खुद की “नेशनल एजुकेशन सोसायटी” के अंतर्गत आती है, जिसमें सत्तार अध्यक्ष और उनकी पत्नी सचिव हैं। तक्रारकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता गणेश शंकरपल्ली ने आरोप लगाया कि अब्दुल सत्तार ने सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग और शासन की आर्थिक धोखाधड़ी की है। तत्कालीन जिल्हाधिकारी और उपसचिव ने भी दस्तावेजों की सही जांच किए बिना मंजूरी दी थी।

कोर्ट का निर्देश — पुलिस को ‘अल्टीमेटम’
गणेश शंकरपल्ली ने पहले सिल्लोड पुलिस स्टेशन और फिर पुलिस अधीक्षक के पास शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने आपराधिक न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने 1 नवंबर को आदेश जारी करते हुए सिल्लोड पुलिस को एक माह के भीतर जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

चुनाव से पहले बढ़ी अब्दुल सत्तार की मुश्किलें
इस न्यायालयीन आदेश से अब्दुल सत्तार की परेशानी बढ़ना तय माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद से सिल्लोड नगरपरिषद में उन्होंने अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी है। मगर बोगस मतदाता और रोहिंग्या प्रकरण में पहले ही भाजपा नेता किरीट सोमैया जैसे विरोधी नेता उन्हें घेर चुके हैं। अब एंबुलेंस फंड के दुरुपयोग का यह मामला चुनावी मौसम में उनके लिए नई राजनीतिक मुसीबत बनकर सामने आया है।

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