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न्याय की प्रतीक्षा…! दिव्यांग स्कूलों के अधीक्षक समान वेतन श्रेणी से वंचित? अधिकारियों की हैरान कर देने वाली भूमिका!

लोणार प्रतिनिधि – फिरदोस खान पठान

लोणार: दिव्यांग बच्चों के कल्याण के लिए कार्यरत ‘समाज सेवी संस्थान’ के अंतर्गत विशेष निवासी विद्यालय और प्रशिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इन संस्थानों में दिव्यांग बच्चों की देखरेख, सुरक्षा और संपूर्ण देखभाल की जिम्मेदारी मुख्य रूप से वसतिगृह अधीक्षक (हॉस्टल अधीक्षक) और गृहपाल पर होती है। इन्हें 24 घंटे स्कूल परिसर में मौजूद रहना पड़ता है और सामान्य बच्चों की तुलना में विशेष बच्चों की देखरेख में अधिक सतर्कता, समय और मानसिक-शारीरिक श्रम लगता है।

इन्हीं कारणों से इन अधीक्षकों ने मांग की थी कि जब वे विशेष डिप्लोमा धारक हैं और उनकी जिम्मेदारियां स्कूल में कार्यरत विशेष शिक्षकों से कहीं अधिक हैं, तो उन्हें भी उन्हीं के अनुरूप वेतन श्रेणी दी जाए। इस विषय पर कई बार महाराष्ट्र राज्य के पुणे स्थित दिव्यांग कल्याण आयुक्तालय ने भी सहमति जताई है कि इन अधीक्षकों की वेतन श्रेणी में सुधार किया जाना चाहिए।

लेकिन, अफसोस की बात है कि बार-बार भेजे गए रिपोर्ट अपूर्ण और त्रुटिपूर्ण होने के कारण, वेतन त्रुटि निवारण समिति (2024) को भेजे जाने वाला संपूर्ण प्रस्ताव अब तक तैयार नहीं हो पाया। मुंबई मंत्रालय के दिव्यांग कल्याण विभाग ने उच्च न्यायालय के आदेश के तहत स्पष्ट किया था कि यह रिपोर्ट त्रुटि निवारण समिति द्वारा भेजी जानी चाहिए। इसके बावजूद भी समय-सीमा लांघ जाने के बाद अब तक रिपोर्ट शासन को प्राप्त नहीं हुई है। इस कारण से शासन स्तर से 12 से अधिक स्मरणपत्र पुणे आयुक्त कार्यालय को भेजे गए हैं।

इस देरी से तंग आकर वर्तमान में कार्यरत वसतिगृह अधीक्षकों व गृहपालों ने राज्य के राज्यमंत्री अॅड. आशीष जयस्वाल से न्याय की गुहार लगाई। मंत्री महोदय ने भी इस विषय को गंभीरता से लेते हुए मुख्य सचिव को पत्र भेजकर दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही की मांग की।

इस पूरे मामले में श्रीमती संगीता डावखरे, सहायक आयुक्त तथा अतिरिक्त प्रभार उपायुक्त, दिव्यांग कल्याण आयुक्तालय पुणे की भूमिका सवालों के घेरे में है। उन्हें त्रुटि निवारण समिति की अध्यक्षता सौंपी गई थी, लेकिन उन्होंने अन्य सदस्यों की राय और सहमति के बिना ही रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेज दी। इस रिपोर्ट में उन्होंने दिव्यांग स्कूलों के अधीक्षकों की तुलना सामान्य स्कूलों के अधीक्षकों से कर दी और कहा कि दिव्यांग अधीक्षकों की जिम्मेदारी कम है। इसी आधार पर रिपोर्ट नकारात्मक रूप में भेजी गई।

अब सवाल उठता है कि क्या वाकई दिव्यांग बच्चों के वसतिगृह में कार्यरत अधीक्षकों की जिम्मेदारी कम है? क्या यह तुलना न्यायोचित है? सामान्य बच्चे स्वयं कई कार्य कर सकते हैं, जबकि दिव्यांग बच्चों को हर छोटे-बड़े कार्य के लिए मदद की आवश्यकता होती है। यह बात वे ही समझ सकते हैं जिनके घर में दिव्यांग बच्चा है।

यदि दिव्यांग स्कूलों की आवश्यकता ही न होती, तो इनके लिए अलग आयुक्तालय क्यों बनाया गया होता? इतना ही नहीं, खुद श्रीमती डावखरे के पास जितनी शालाएं नहीं हैं, उससे अधिक स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत आती हैं, फिर भी शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कार्यभार अधिक मानकर दिव्यांग कल्याण अधिकारियों की जिम्मेदारी कम कैसे ठहराई जा सकती है?

दिव्यांग कल्याण विभाग को अलग बनाकर सरकार ने सराहनीय कदम उठाया था, लेकिन इस विभाग को कमजोर करने में कुछ स्वार्थी और मनमानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका चिंताजनक है। आज तक इस विभाग के लिए कोई स्वतंत्र मंत्री या राज्यमंत्री नहीं नियुक्त हुआ है; वर्षों से यह विभाग मुख्यमंत्री के पास ही है।

इस वजह से दिव्यांग अधीक्षकों को न्याय नहीं मिल रहा है और शासन की ओर भेजे गए पत्रों की फाइलें कबाड़ में पड़ी नजर आती हैं। ऐसे में सवाल उठता है – क्या इन अधीक्षकों को न्याय कभी मिलेगा?

– महाराष्ट्र राज्य दिव्यांग शाळा/कर्मशाळा संलग्न वसतिगृह अधीक्षक महासंघ
प्रविण अवसरमोल, जिला प्रतिनिधि – महाराष्ट्र राज्य अपंग शाळा, कर्मशाळा व अधीक्षक संघटना

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