EditorialMaharashtraPolitics

✍️ संपादकीय – मराठा आरक्षण आंदोलन: जीत किसकी, जरांगे की या फडणवीस की?

– सय्यद फेरोज़ आशिक (कार्यकारी संपादक)

महाराष्ट्र की राजनीति में आरक्षण हमेशा से बारूद की तरह रहा है। मामूली सी चिंगारी भी राज्य को हिला सकती है। पिछले दिनों मुंबई में मराठा नेता मनोज जरांगे का पाँच दिवसीय अनशन उसी बारूद पर खेली गई बाज़ी थी। आंदोलन का पटाक्षेप हुआ और जरांगे ने इसे अपनी जीत बताई। मगर सवाल यह है कि असल जीत किसकी हुई – जरांगे की या राज्य के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की?

जरांगे की उपलब्धि केवल इतनी रही कि मराठवाड़ा क्षेत्र में तत्कालीन हैदराबाद रियासत का गज़टियर लागू कर मराठों को कुणबी मानकर ओबीसी प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन मिला। वह भी ग्राम स्तर पर सूक्ष्म जांच के बाद। पूरे महाराष्ट्र के लिए यह व्यवस्था लागू होगी या नहीं, इस पर केवल “विचार करने” का भरोसा दिया गया है। यानी दूध माँगा गया, तो छाछ दी गई।

फडणवीस ने एक तीर से कई निशाने साधे। जरांगे को झुनझुना पकड़ा कर आंदोलन की हवा निकाल दी, ओबीसी समाज को आश्वस्त किया कि उनका हिस्सा कोई नहीं छीन पाएगा, और खुद को मराठा हितैषी बताने का अवसर भी ले लिया। अदालत की फटकार और मुंबई में बढ़ती अव्यवस्था ने आंदोलन की कमर वैसे ही तोड़ दी थी। कोर्ट ने साफ कहा कि मंगलवार तक हर हाल में आंदोलन खत्म होना चाहिए। जरांगे के पास पीछे हटने के सिवा विकल्प ही क्या था?

असल में जरांगे का आंदोलन भावनात्मक था, लेकिन रणनीति विहीन। लाखों मराठों की भीड़ जरूर जुटी, मगर उसके पोषण के लिए बुनियादी तैयारी तक नहीं थी। पानी, शौचालय, खाने का इंतजाम नहीं और सरकार का रवैया ठंडा। यह लड़ाई शुरू से ही आधी अधूरी थी।

अब बड़ा सवाल यह है कि जरांगे की ‘जीत’ आगे कितनी टिकेगी? क्योंकि ओबीसी समुदाय ने पहले ही सीना ठोककर विरोध जताना शुरू कर दिया है। उनकी दलील वाजिब है – जब गरीब मराठाओं को 10% अनारक्षित कोटे में आरक्षण दिया गया है तो उन्हें कुणबी बनाकर ओबीसी आरक्षण क्यों दिया जाए? यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज होना तय है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में मराठों की आबादी 28-33% और ओबीसी की भी लगभग उतनी ही है। यानी दोनों समाज संख्याबल में बराबर। ऐसे में किसी एक के पक्ष में झुकना राजनीति के लिए आत्मघाती हो सकता है। यही कारण है कि फडणवीस बेहद चतुराई से “कानूनन आरक्षण मिलेगा” जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

जरांगे ने भावनाओं की राजनीति की, लेकिन फडणवीस ने शतरंज की। उन्होंने मराठों को भी भरोसा दिया और ओबीसी को भी नहीं नाराज़ किया। खुद को सीधे मैदान में उतारने के बजाय विखे पाटिल जैसी कैबिनेट समिति को आगे कर दिया। और जब समझौता हुआ, उसी वक्त उनके करीबी वकील गुणरत्न सदावर्ते ने इसे असंवैधानिक करार देकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह दी। यानी रास्ता फिर न्यायालय के हवाले। सरकार बचाव में और आंदोलन ठंडा।

मराठा समाज का दर्द असली है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन जरांगे की रणनीति अधूरी रही और उनकी मांगें संवैधानिक उलझनों में जकड़ी हुई हैं। दूसरी ओर, फडणवीस ने संकट को अवसर में बदलते हुए खुद को मराठा और ओबीसी दोनों का हितैषी साबित कर दिया।

नतीजा साफ है – जरांगे का आंदोलन भले मराठा समाज की आहट जगाने में सफल रहा हो, पर राजनीतिक जीत फिलहाल फडणवीस की झोली में गई है। आगे का रास्ता आसान नहीं। ओबीसी और मराठों का टकराव गहराएगा, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा और आने वाले विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा और ज्यादा सुलगकर सामने आएगा।

जरांगे की जिद और फडणवीस की चाल – यही है मराठा आरक्षण आंदोलन का असली चेहरा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button