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ग़ज़ा: भूख, बारूद और बेबसी का वह सच जिसे दुनिया अब नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती

Writer – Feroz Aashiq

ग़ज़ा पट्टी पिछले दो वर्षों से एक ऐसे युद्धक्षेत्र में तब्दील हो चुकी है जहाँ आसमान से बारूद बरसता है और ज़मीन पर भूख बिछी है। बच्चों की लाशें, भूख से तड़पते परिवार, नष्ट हो चुके अस्पताल, और मलबे में दबे सपने — यही है आज के ग़ज़ा की तस्वीर। लेकिन सवाल सिर्फ ग़ज़ा का नहीं, सवाल मानवता का है। सवाल यह है कि जब ज़मीर मर जाता है तो क्या कूटनीति की चुप्पी इंसाफ़ का विकल्प बन सकती है?

भूख का हथियार और युद्ध की राजनीति

अक्टूबर 2023 से जारी इसराइली हमले अब सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं हैं, यह एक सुनियोजित मानवीय आपदा है। इंटरनेशनल फूड सिक्योरिटी रिपोर्ट्स, WFP और WHO की चेतावनियों के बावजूद इसराइल की नाकेबंदी ने ग़ज़ा को भूख के अंधकार में धकेल दिया है। जुलाई 2025 की रिपोर्ट बताती है कि एक तिहाई ग़ज़ाई नागरिक कई-कई दिन भूखे रहते हैं। कुपोषण से बच्चों की मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की असफलता का आईना हैं।

मानवाधिकार संगठन, यहाँ तक कि इसराइल के भीतर के भी कुछ संगठन जैसे B’Tselem और PHRI, अब खुलकर कह रहे हैं कि इसराइल भोजन और स्वास्थ्य सेवा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। क्या यह बात अब भी बहस योग्य है या इसे खुलेआम ‘नरसंहार’ कहा जाना चाहिए?

जब सहायता भी निशाना बन जाए

सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि ग़ज़ा में अब सहायता पहुँचाना भी मौत को न्योता देने जैसा हो गया है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य एजेंसियों की गाड़ियों पर हमले, बच्चों समेत आम नागरिकों की हत्या — यह सब कुछ एक ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के नाम पर हो रहा है, जिसमें मानवाधिकार सिर्फ भाषणों की शोभा बन चुके हैं।

1100 से अधिक लोगों की मौत उन इलाकों में हुई है जहाँ सिर्फ खाना बाँटा जा रहा था। क्या यही है “सुरक्षा की गारंटी”? क्या यही है “आत्मरक्षा का अधिकार”?

अंतरराष्ट्रीय मीडिया और ट्रंप का बदला रुख

लंबे समय तक आंखें मूंदे बैठा अंतरराष्ट्रीय मीडिया अब मजबूरन ग़ज़ा की भयावहता दिखा रहा है। CNN से लेकर The Guardian तक, अब हर मंच पर ग़ज़ा की त्रासदी का चित्र सामने आ रहा है। यहाँ तक कि इसराइल के करीबी माने जाने वाले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक को कहना पड़ा — “ग़ज़ा में भुखमरी असली है। यह कोई झूठ नहीं।” क्या यह बदलाव देर से आया जागरण है, या सिर्फ राजनैतिक मजबूरी?

भारत की चुप्पी: क्या यह हमारी परंपरा के खिलाफ नहीं?

भारत, जो हमेशा से विश्व में न्याय, करुणा और ग़रीबों के साथ खड़े रहने की मिसाल रहा है, इस संकट पर मौन क्यों है? महात्मा गाँधी ने इसराइल के गठन का विरोध किया था, क्योंकि उन्हें पता था कि यह संघर्ष सिर्फ ज़मीन का नहीं, इंसानियत के अस्तित्व का होगा। आज उसी संघर्ष में भारत की सरकार तटस्थ बनी हुई है।

कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी की हालिया टिप्पणी, जिसमें उन्होंने ग़ज़ा में हो रही इसराइली कार्रवाई को “नरसंहार” कहा, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस नैतिक चेतना की पुकार है जो भारत की आत्मा में रची-बसी है। उन्होंने मोदी सरकार की चुप्पी को “मानवता के खिलाफ अपराध” बताया — और यह आलोचना पूरी तरह वाजिब है।

क्या हम इतिहास के कटघरे में खड़े हैं?

आज जब पूरी दुनिया ग़ज़ा की चीखों को सुन रही है, भारत की चुप्पी उस सन्नाटे की तरह है जो सबसे ज़्यादा गूंजता है। न कोई स्पष्ट रुख, न कोई ठोस मानवीय सहायता, और न ही विरोध के लिए लोकतांत्रिक स्थान। क्या यही है न्यू इंडिया की विदेश नीति?

क्या हम भूल रहे हैं कि जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद था, भारत सबसे पहले खड़ा हुआ था? क्या आज फिलिस्तीन के लिए खड़ा होना हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं?

अंत में…

ग़ज़ा में जो हो रहा है वह युद्ध नहीं, वह सत्ता की भूख से उपजा नरसंहार है। और यदि दुनिया, विशेषकर भारत जैसे देश, आज भी चुप रहते हैं, तो कल इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा। इंसानियत का धर्म किसी झंडे या धर्म से ऊपर होता है। यह वक़्त है आवाज़ उठाने का — क्योंकि चुप्पी अब तटस्थता नहीं, अपराध है।

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